सत्ता जाने के बाद ममता को याद आए पुराने साथी, विपक्षी मोर्चे पर कांग्रेस-लेफ्ट का इनकार

HIGHLIGHTS
- ममता बनर्जी ने भाजपा के खिलाफ विपक्षी एकता का आह्वान किया।
- कांग्रेस और वाम दलों ने तृणमूल के साथ तुरंत मोर्चा बनाने से इनकार किया।
- बंगाल की राजनीति में विपक्षी एकता को लेकर नए समीकरणों पर चर्चा तेज हुई।
कोलकाता। बंगाल की सत्ता गंवाने के बाद अब पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को कांग्रेस और वाम दलों के साथ की जरूरत महसूस होने लगी है। भाजपा के खिलाफ विपक्षी एकजुटता की अपील वह कई बार कर चुकी हैं। हाल ही में शहीद दिवस के मंच से भी उन्होंने कांग्रेस, लेफ्ट और अल्ट्रा-लेफ्ट समेत सभी विरोधी दलों से एक मंच पर आने का आह्वान किया।
हालांकि, ममता बनर्जी की इस पहल पर कांग्रेस और वाम दलों ने ही सवाल खड़े कर दिए हैं। दोनों दलों ने तृणमूल कांग्रेस के साथ तुरंत किसी गठबंधन या मोर्चे की संभावना से इनकार करते हुए भाजपा के बढ़ते प्रभाव के लिए तृणमूल की राजनीति को भी जिम्मेदार बताया है।
नौ मई को ममता बनर्जी ने भाजपा के खिलाफ ‘ज्वाइंट प्लेटफॉर्म’ बनाने की अपील की थी। उनका कहना था कि भाजपा के खिलाफ लड़ाई में सभी विपक्षी दलों को अपने मतभेद भुलाकर एकजुट होना चाहिए।
‘भाजपा के उभार के लिए तृणमूल भी जिम्मेदार’
ममता के इस प्रस्ताव के बाद कांग्रेस और वाम दलों की प्रतिक्रिया तृणमूल के लिए चुनौती बन गई। माकपा के राज्य सचिव मोहम्मद सलीम ने तृणमूल नेतृत्व पर भ्रष्टाचार और सांप्रदायिक राजनीति के आरोप लगाते हुए प्रस्ताव को खारिज कर दिया। वहीं माकपा नेता सुजन चक्रवर्ती ने ममता की भाजपा विरोधी राजनीति की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए।
वाम नेताओं का कहना है कि बंगाल में भाजपा के मजबूत होने के पीछे तृणमूल की राजनीति भी एक कारण रही है। वहीं वरिष्ठ कांग्रेस नेता प्रदीप भट्टाचार्य ने सवाल उठाया कि जब तृणमूल ने चुनावों में कांग्रेस को लगातार निशाना बनाया, तो सत्ता से बाहर होने के बाद अब उसी पार्टी के साथ एकजुटता की जरूरत क्यों महसूस हो रही है।
सत्ता में विरोध, विपक्ष में सहयोग की जरूरत
बंगाल की राजनीति में मौजूदा समय का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि सत्ता में रहते हुए तृणमूल कांग्रेस ने कांग्रेस और लेफ्ट को अपना प्रमुख प्रतिद्वंद्वी माना था। लेफ्ट के लंबे शासन को खत्म कर सत्ता में आने के बाद तृणमूल ने दोनों दलों के राजनीतिक आधार को भी प्रभावित किया।
अब राजनीतिक स्थिति बदल चुकी है। भाजपा सत्ता में है और तृणमूल विपक्ष में। ऐसे में ममता बनर्जी की विपक्षी एकता की अपील को राजनीतिक मजबूरी के तौर पर भी देखा जा रहा है।
साथ आने पर जोखिम, अलग रहने पर भाजपा को फायदा
राजनीतिक विश्लेषक और रवीन्द्र भारती विश्वविद्यालय के प्रोफेसर बिश्वनाथ चक्रवर्ती के अनुसार, कांग्रेस और वाम दलों के सामने भी बड़ी चुनौती है। भाजपा के खिलाफ तृणमूल के साथ आने से उनकी अलग राजनीतिक पहचान और संगठन के विस्तार पर असर पड़ सकता है।
वहीं, अगर विपक्षी दल अलग-अलग चुनाव लड़ते हैं तो विपक्षी वोटों के बंटवारे का फायदा भाजपा को मिल सकता है। ममता बनर्जी की पहल तृणमूल को विपक्ष में मजबूत करने में मदद कर सकती है, लेकिन कांग्रेस और लेफ्ट के लिए यह कदम राजनीतिक जोखिम वाला हो सकता है।
दूसरी ओर, अगर तीनों दल एक साथ आते हैं तो भाजपा को विपक्षी एकता के खिलाफ नया मुद्दा मिल सकता है। फिलहाल कांग्रेस और लेफ्ट की शुरुआती प्रतिक्रिया से साफ है कि वे तुरंत तृणमूल के साथ आने के लिए तैयार नहीं हैं। ऐसे में ममता बनर्जी की ‘विपक्षी एकता’ की अपील अभी राजनीतिक संदेश तक ही सीमित नजर आ रही है।
Comments0
Leave a comment
Join the conversation — your email will not be published.

Reader comments
No comments yet
Be the first to share your perspective on this story.