तो कांशीराम बन जाते कांग्रेसी मुख्यमंत्री !

राहुल गांधी की जुबान से किस समय क्या बात निकल जाये, शायद वे भी न जानते हों। अलबत्ता जब उन्हें गालियां देनी होती हैं तब उन्हें ज़रूर पता होता है कि उन्हें किसे और कैसे गरियाना है। 13 मार्च, 2026 को महाशयजी का लखनऊ प्रवास था। वहां कांग्रेस पार्टी ने उनके सम्मान में कांशीराम जयंती एवं दलित संवाद कार्यक्रम आयोजित किया हुआ था। निश्चित ही उनके इशारे पर ही दलित संवाद का आयोजन किया गया होगा क्योंकि उन्हें मुगालता है कि दलित प्रेम के नाम पर कांग्रेस 2027 की चुनावी वैतरणी पार कर लेगी।
लखनऊ के दलित संवाद में राहुल गांधी बोले कि यदि आज जवाहरलाल नेहरु होते तो कांशीराम उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे होते। फिर बोले कि यदि उत्तर प्रदेश में कांशीराम जैसे 100 कांग्रेस कार्यकर्ता मिल जायें तो नक्शा बदल जाएगा। अगले ही क्षण बोले कि यदि कांग्रेस ठीक से काम कर रही होती तो हमें कांशीराम जैसों की क्या जरूरत थी। इतने विरोधा भाषी विचारों को राहुल गांधी के कट्टर चाटुकार ही पचा पाते हैं!
राहुल ने स्वीकारा कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस क्रियाशील या प्रभावी नहीं। उसे कांशीराम जैसे 100 नेताओं की जरूरत है। फिर कहा कि कांग्रेस मजबूत होती तो कांशीराम को आन्दोलन करने की क्या जरूरत पड़ती। यह भी कहा कि कांग्रेस सत्ता के लिए नहीं परिवर्तन के लिए लड़ रही है। परिवर्तन कैसा? क्या सत्ता का परिवर्तन? या सामाजिक परिवर्तन? कांशीराम क्या मुख्यमंत्री पद के आकांक्षी थे जो वे उत्तर प्रदेश कांग्रेसी मुख्यमंत्री बनते।
दुर्भाग्य से कांशीराम हमारे बीच नहीं हैं। यदि उन्हें पद की इच्छा होती तो योग्यता एवं सामाजिक चिन्तन के अनुरूप प्रधानमंत्री पद के लायक थे। वस्तुतः कांशीराम राजनीतिक सत्तालोलुप नेता नहीं थे। डॉ. भीमराव आम्बेडकर के समकक्ष समाज सुधारक थे और उनमें दूसरों को मुख्यमंत्री बनाने की क्षमता थी। डॉ. आम्बेडकर के समान ही सदियों से चली आ रही सड़ी गली व्यवस्था को बदल कर वे करोड़ों दलितों-पीड़ितों का कल्याणकारी समाज बनाना चाहते थे।
राहुल गांधी ने कांशीराम का सम्मान करने के बजाय उनके विषय में अंतर्विरोधी विचार प्रकट कर उनका अपमान किया है। उनके पड़नाना जवाहरलाल नेहरू ने डॉ. भीमराव आम्बेडकर जैसे विराट व्यक्तित्व के धनी एवं क्रान्तिदर्शी समाज सुधारक को चुनाव में दो-दो बार हराने का कुचक्र रचा। राहुल कांशीराम को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाने की बात करते हैं। जब जवाहरलाल कांग्रेस संगठन एवं सरकार के सर्वेसर्वा थे तो चौ. गिरधारी लाल या बलदेव सिंह आर्य को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री क्यों नहीं बनाया गया?
दलितों, पिछड़ों से इतना ही प्रेम था तो बाबू जगजीवन राम को कांग्रेस ने प्रधानमंत्री क्यों नहीं बनाया? राहुल की दादी के मुकाबले कहीं ज्यादा योग्य, अनुभवी, दक्ष और सच्चे राष्ट्रभक्त तथा सर्व समाज के प्रिय नेता थे।
दलित संवाद में राहुल ने जेब से पैन निकाल कर उसकी कैप अलग कर जमूरे की तरह दलितों, पिछड़ों की व्याख्या की। चापलूसों की जमात में तो ऐसी नौटंकी पर तालियां बज जाती है लेकिन समाज का बड़ा हिस्सा यथार्थ को समझता और देखता है। टोटके बाजी को लोग नकार रहे हैं, राहुल यह क्यों समझ नहीं पाते? राहुल को अन्ततः समझ ना होगा कि डॉ. आम्बेडकर एवं कांशीराम जैसे कद्दावर नेताओं के समक्ष वे और उनके मां, बाप, नाना, दादा, सब बौने हैं।
गोविंद वर्मा
संपादक 'देहात'
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