भारत और यूरोपीय संघ का बड़ा व्यापार समझौता, अमेरिका ने जताई आपत्ति

भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच इस सप्ताह एक महत्वपूर्ण व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने की तैयारी है। यह समझौता न केवल भारत के लिए, बल्कि दुनिया के कई बड़े आर्थिक खिलाड़ियों के लिए भी अहम माना जा रहा है। अमेरिका ने इस डील पर आपत्ति जताई है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा कि अमेरिका ने भारत पर रूस से तेल खरीदने के लिए 25 प्रतिशत शुल्क लगाया, जबकि यूरोपीय देशों ने इसी बीच भारत के साथ व्यापार समझौते पर सहमति बना ली।
बेसेंट ने आरोप लगाया कि यूरोपीय देश भारत से रिफाइन किए हुए रूसी तेल का आयात कर अपनी ही रणनीतिक स्थिति को कमजोर कर रहे हैं। उनका कहना है कि रूस-यूक्रेन युद्ध में अमेरिका ने भारी बलिदान दिए हैं और ट्रंप प्रशासन की कोशिशें युद्ध समाप्ति की दिशा में रही हैं।
भारत के लिए समझौते का महत्व
भारत-ईयू समझौता केवल शुल्कों में कटौती तक सीमित नहीं होगा। यह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए कई अवसर खोल सकता है। यूरोपीय संघ भारत के सबसे बड़े व्यापारिक भागीदारों में से एक है। इस डील के जरिए भारत अपनी सेवाओं के निर्यात को बढ़ाने और उच्च तकनीकी निवेश आकर्षित करने की योजना बना रहा है। वाणिज्य मंत्रालय का कहना है कि वार्ता का लक्ष्य MSME और भारतीय उद्यमियों को यूरोपीय बाजार में आसान पहुंच देना है, ताकि भारत वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में मजबूत स्थिति बना सके।
यदि यह समझौता इस महीने के अंत में शीर्ष नेतृत्व की यात्रा के दौरान घोषणा के साथ लागू होता है, तो यह न केवल भारतीय निर्यातकों के लिए नए अवसर खोलेगा, बल्कि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सुरक्षा कवच भी साबित होगा। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने इसे “मदर ऑफ ऑल डील्स” कहा, जिससे उद्योग जगत और नीति निर्माताओं में सकारात्मक माहौल बना है।
समझौते के प्रमुख बिंदु:
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यह भारत और 27 देशों के व्यापारिक ब्लॉक के बीच लागू होगा।
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सरकार इसे ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ और निर्यातकों के लिए ‘सुपर डील’ मान रही है।
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उद्देश्य: वस्तुओं और सेवाओं के व्यापार में संतुलन और वृद्धि सुनिश्चित करना।
इस समझौते के पूरा होने के बाद भारत-ईयू आर्थिक रिश्ते को नई दिशा मिलेगी और दोनों पक्षों को व्यापारिक लाभ के व्यापक अवसर मिलेंगे।
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