अप्रैल में भारत के निर्यात में जोरदार बढ़ोतरी, लेकिन पश्चिम एशिया व्यापार में बड़ी गिरावट

अप्रैल महीने में भारत के व्यापारिक आंकड़ों ने मिश्रित तस्वीर पेश की है। जहां एक ओर देश के कुल निर्यात में मजबूत बढ़ोतरी दर्ज की गई, वहीं पश्चिम एशियाई देशों के साथ व्यापार में उल्लेखनीय गिरावट देखने को मिली। वाणिज्य मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक बाजार में भारतीय उत्पादों की मांग बढ़ी है, लेकिन खाड़ी क्षेत्र में जारी अस्थिरता का असर व्यापार पर साफ दिखाई दिया।
कुल निर्यात में दोहरे अंकों की बढ़ोतरी
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल 2026 में भारत का कुल निर्यात 13.78 प्रतिशत बढ़कर 43.56 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया। यह बढ़ोतरी पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक बाजार में भारतीय वस्तुओं की स्थिर मांग और निर्यातकों के बेहतर प्रदर्शन ने इस वृद्धि में अहम भूमिका निभाई।
आयात में भी बढ़ी रफ्तार
आयात के मोर्चे पर भी वृद्धि दर्ज की गई है। अप्रैल के दौरान भारत का कुल आयात 10 प्रतिशत बढ़कर 71.94 अरब डॉलर पहुंच गया, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 65.38 अरब डॉलर था। इससे संकेत मिलता है कि घरेलू मांग और औद्योगिक गतिविधियां लगातार मजबूत बनी हुई हैं।
पश्चिम एशिया के साथ व्यापार में बड़ी गिरावट
हालांकि कुल व्यापारिक प्रदर्शन सकारात्मक रहा, लेकिन पश्चिम एशिया के साथ कारोबार में तेज गिरावट चिंता का कारण बनी हुई है। वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने बताया कि इस क्षेत्र के साथ भारत के निर्यात और आयात दोनों में भारी कमी दर्ज की गई है।
पश्चिम एशिया को होने वाला भारत का निर्यात अप्रैल में करीब 28 प्रतिशत घटकर 4.16 अरब डॉलर रह गया, जबकि पिछले साल यह 5.78 अरब डॉलर था। वहीं इस क्षेत्र से आयात में भी 31.64 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई और आयात घटकर 10.47 अरब डॉलर रह गया।
खाड़ी संकट का असर
विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव और आपूर्ति संबंधी बाधाओं का असर व्यापारिक गतिविधियों पर पड़ा है। इसी पृष्ठभूमि में हाल ही में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी भी देखने को मिली है। सरकार ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में बढ़ती कीमतों और खाड़ी देशों के साथ व्यापारिक व्यवधान को इसका प्रमुख कारण बताया है।
आगे क्या?
व्यापारिक आंकड़े यह संकेत देते हैं कि भारत की समग्र आर्थिक गतिविधियां मजबूत बनी हुई हैं, लेकिन पश्चिम एशिया के साथ व्यापार में आई गिरावट आने वाले महीनों में नीति निर्माताओं के लिए चिंता का विषय रह सकती है। अब नजर इस बात पर होगी कि यह गिरावट अस्थायी है या इसका असर लंबी अवधि तक देखने को मिलेगा।
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