खैबर पख्तूनख्वा में लश्कर आतंकी यूसुफ अफरीदी की गोली मारकर हत्या

पाकिस्तान के अशांत प्रांत खैबर पख्तूनख्वा में एक बड़ी वारदात सामने आई है, जहां लश्कर-ए-तैयबा के वरिष्ठ सदस्य और हाफिज सईद के करीबी सहयोगी शेख यूसुफ अफरीदी की गोली मारकर हत्या कर दी गई। यह घटना खैबर जिले के लांडी कोटल क्षेत्र में हुई, जिससे पूरे इलाके में तनाव फैल गया है।
घात लगाकर किया गया हमला
पाकिस्तानी पुलिस के अनुसार, यह हमला रविवार को हुआ जब अज्ञात हमलावरों ने यूसुफ अफरीदी को निशाना बनाकर अचानक फायरिंग शुरू कर दी। गोलियों की बौछार में अफरीदी की मौके पर ही मौत हो गई। हमलावर वारदात को अंजाम देने के बाद आसानी से फरार हो गए। फिलहाल किसी भी संगठन ने इस हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है।
लश्कर के अहम नेटवर्क से जुड़ा था अफरीदी
यूसुफ अफरीदी को लश्कर-ए-तैयबा के क्षेत्रीय ढांचे का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता था। वह खैबर पख्तूनख्वा और आसपास के कबायली इलाकों में संगठन के लिए भर्ती और नेटवर्क विस्तार की जिम्मेदारी संभालता था। इसके अलावा सीमावर्ती क्षेत्रों में हथियारों की सप्लाई और सुरक्षित ठिकानों की व्यवस्था में भी उसकी भूमिका बताई जाती थी।
सूत्रों के अनुसार, अफरीदी कट्टरपंथी विचारधारा से जुड़ा हुआ था और अपने भाषणों के जरिए युवाओं को प्रभावित कर संगठन में शामिल करने की कोशिश करता था।
हाफिज सईद के लिए लगातार झटके
मुंबई हमले के मास्टरमाइंड हाफिज सईद के लिए यह घटना एक और बड़ा झटका मानी जा रही है। पिछले कुछ समय से लश्कर-ए-तैयबा के कई वरिष्ठ नेता निशाने पर हैं। कुछ ही दिनों पहले संगठन के संस्थापक सदस्यों में शामिल आमिर हमजा पर लाहौर में हमला हुआ था।
यूसुफ अफरीदी की हत्या से वह नेटवर्क कमजोर हुआ है, जो कबायली क्षेत्रों से नए आतंकियों की भर्ती और प्रशिक्षण में अहम भूमिका निभाता था।
अंदरूनी संघर्ष की आशंका
2019 से जेल में बंद हाफिज सईद के लिए यह घटनाक्रम संगठन के भीतर बढ़ती अस्थिरता का संकेत माना जा रहा है। बताया जा रहा है कि आतंकी गुटों के बीच वर्चस्व की लड़ाई तेज हो गई है और विचारधारात्मक मतभेद अब हिंसक टकराव में बदलते दिख रहे हैं।
सूत्रों के अनुसार, जमात-उद-दावा ने इस हमले के पीछे तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) जैसे गुटों की भूमिका की आशंका जताई है, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
यह घटना इस ओर भी इशारा करती है कि पाकिस्तान के भीतर सक्रिय आतंकी संगठनों के सुरक्षित माने जाने वाले ठिकाने भी अब अस्थिरता और आंतरिक संघर्ष से अछूते नहीं रह गए हैं।
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