अमेरिकी शांति बोर्ड में एंट्री पर घिरे शहबाज, संसद को नजरअंदाज करने का आरोप

अमेरिका के साथ बढ़ती नजदीकियों के बीच पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ अपने ही देश में तीखी आलोचना के घेरे में आ गए हैं। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अगुवाई में बनाए गए एक अंतरराष्ट्रीय ‘शांति बोर्ड’ में शामिल होने के उनके फैसले को लेकर विपक्ष ने सवालों की झड़ी लगा दी है।
गुरुवार को दावोस में आयोजित कार्यक्रम के दौरान पाकिस्तान समेत 19 देशों के नेताओं ने इस समूह के चार्टर पर हस्ताक्षर किए। इस मौके पर शहबाज शरीफ ट्रंप के बगल में बैठे दिखाई दिए। लेकिन जैसे ही यह खबर पाकिस्तान पहुंची, राजनीतिक गलियारों में हड़कंप मच गया।
शांति बोर्ड का मकसद क्या है?
इस बोर्ड के गठन का विचार गाजा युद्ध के दौरान सामने आया था, जब अमेरिका ने अपनी शांति योजना पेश की थी। शुरुआत में इसका उद्देश्य गाजा में शांति प्रक्रिया की निगरानी बताया गया था, लेकिन अब इसे वैश्विक संघर्षों में मध्यस्थ की भूमिका निभाने वाले मंच के रूप में देखा जा रहा है। कई विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप इसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के समानांतर ढांचे के रूप में विकसित करना चाहते हैं।
पीटीआई ने उठाए सवाल
पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) ने सरकार के इस कदम पर नाराजगी जताई है। पार्टी अध्यक्ष गोहर अली खान ने कहा कि प्रधानमंत्री ने बिना किसी सलाह-मशवरे के इस बोर्ड में शामिल होने का फैसला कर लिया। उन्होंने आरोप लगाया कि संसद को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया।
गोहर अली खान ने कहा कि सरकार को पहले यह स्पष्ट करना चाहिए था कि इस बोर्ड की शर्तें क्या हैं और पाकिस्तान से किस तरह की भूमिका की अपेक्षा की जाएगी। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या पाकिस्तान से हमास को निरस्त्र करने जैसी कार्रवाइयों में हिस्सा लेने की उम्मीद की जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि अगर यह संयुक्त राष्ट्र का कोई मंच होता तो सरकार का फैसला समझा जा सकता था, लेकिन यह बोर्ड किसी अंतरराष्ट्रीय संस्था का आधिकारिक निकाय नहीं है।
लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर भी सवाल
पाकिस्तानी अखबार ‘डॉन’ के हवाले से पीटीआई के वरिष्ठ नेता असद कैसर ने कहा कि सरकार ने इतने संवेदनशील मुद्दे पर सर्वदलीय सहमति बनाने की कोशिश तक नहीं की। उन्होंने कहा कि संसद में इस पर खुली बहस होनी चाहिए थी, ताकि दुनिया के सामने यह संदेश जाए कि पाकिस्तान में लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं मजबूत हैं।
जेयूआई-एफ का तीखा हमला
जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम (फजल) के प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान ने भी सरकार के फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि ऐसे किसी मंच का हिस्सा बनना गलत है, जिसमें फलस्तीन की पीड़ा के लिए जिम्मेदार ताकतें भी शामिल हों।
रहमान ने संसद में कहा कि गाजा में बमबारी जारी है और ऐसे में ट्रंप से शांति की उम्मीद करना “ख्वाबों की दुनिया में जीने” जैसा है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि इस बोर्ड के अध्यक्ष ट्रंप ने अपनी मर्जी से सदस्यों का चयन किया है। उनके मुताबिक, जिस मंच पर इजरायल के प्रधानमंत्री और पाकिस्तान के नेता साथ बैठेंगे, वह फलस्तीन के पक्ष में कैसे निष्पक्ष हो सकता है।
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