मानहानि मामले में सुप्रीम कोर्ट सख्त, मेधा पाटकर की याचिका पर विचार से किया इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (8 सितंबर) सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने दिल्ली के उपराज्यपाल वीके सक्सेना के खिलाफ 25 साल पुराने मानहानि मामले में अतिरिक्त गवाह से पूछताछ की अनुमति देने के लिए हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी।
जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने कहा कि वे दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप नहीं करेंगे। इसके बाद पाटकर के वकील ने मामले को वापस लेने की अनुमति मांगी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर लिया।
मेधा पाटकर ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी याचिका वापस ले ली, जिसमें उन्होंने हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी, जिसने उन्हें 25 साल पुराने मामले में नए गवाह पेश करने की अनुमति नहीं दी थी। निचली अदालत ने भी नए गवाह को पेश करने से इनकार किया था, यह कहते हुए कि यह केवल मुकदमे में देरी करने की रणनीति है।
यह मामला दिसंबर 2000 का है, जब पाटकर ने शिकायत की थी कि 10 नवंबर 2000 को प्रकाशित एक समाचार पत्र का विज्ञापन मानहानिकारक था। शिकायत में अखबार के प्रकाशक, संपादक और वीके सक्सेना को आरोपी बनाया गया था। 2008 में दो आरोपियों के खिलाफ कार्यवाही रद्द हो गई थी, जबकि मुकदमा सक्सेना के खिलाफ जारी रहा।
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा, जिसने 18 मार्च के प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश को सही ठहराया था। कोर्ट ने यह भी कहा कि मेधा पाटकर का अतिरिक्त गवाह पेश करने का अनुरोध वास्तविक जरूरत नहीं बल्कि मुकदमे में देरी करने का प्रयास प्रतीत होता है।
मुकदमे में 2018 और 2024 के बीच चार अभियोजन गवाहों से पूछताछ की गई थी, जिसमें खुद पाटकर भी शामिल थीं। हालांकि समझौते, कोविड-19 और स्थगन के कारण मामले में लंबी देरी हुई।
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