नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी में विलय करेगा TMC का बागी गुट, स्पीकर ओम बिरला को सौंपा पत्र

नई दिल्ली। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में जारी अंदरूनी खींचतान अब खुलकर सामने आ गई है। पार्टी की बागी सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने दावा किया है कि उनके साथ मौजूद 20 सांसदों का समूह जल्द ही नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी (NCP) में शामिल होगा। इस संबंध में उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात कर अलग बैठने की व्यवस्था की मांग भी की है।
लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात के बाद मीडिया से बातचीत में काकोली घोष ने कहा कि उनके नेतृत्व वाला समूह टीएमसी से चुने गए सांसदों का दो-तिहाई से अधिक हिस्सा होने का दावा करता है। उन्होंने बताया कि स्पीकर को एक पत्र सौंपकर सदन में अलग पहचान और बैठने की व्यवस्था का अनुरोध किया गया है।
NDA के साथ काम करने का संकेत
काकोली घोष ने कहा कि उनका समूह नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी में विलय की प्रक्रिया में है और भविष्य में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के साथ मिलकर काम करने की दिशा में आगे बढ़ेगा। उनके इस बयान के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
टीएमसी की मुश्किलें बढ़ीं
लोकसभा में 28 सांसदों वाली तृणमूल कांग्रेस के लिए यह घटनाक्रम बड़ा झटका माना जा रहा है। यदि बागी गुट के दावे सही साबित होते हैं, तो संसद में पार्टी की स्थिति प्रभावित हो सकती है। साथ ही विपक्षी दलों की संख्या और ताकत पर भी इसका असर पड़ने की संभावना जताई जा रही है।
राजनीतिक सूत्रों का कहना है कि अलग संसदीय गुट बनाने के बजाय किसी अन्य राजनीतिक दल में विलय का रास्ता चुनने के पीछे कानूनी चुनौतियों से बचने की रणनीति भी हो सकती है।
अभिषेक बनर्जी गुट ने किया विरोध
इस पूरे घटनाक्रम के बीच टीएमसी सांसद कीर्ति आजाद और सागरिका घोष ने भी लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात की। उन्होंने पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और संसदीय दल के नेता अभिषेक बनर्जी की ओर से एक पत्र सौंपा, जिसमें बागी सांसदों की मांग को स्वीकार नहीं करने का अनुरोध किया गया।
पत्र में कहा गया कि संसद में किसी भी विधायी दल की पहचान उसकी मूल राजनीतिक पार्टी से जुड़ी होती है और पार्टी के भीतर समानांतर संसदीय गुट को मान्यता नहीं दी जा सकती। साथ ही यह भी तर्क दिया गया कि कानून राजनीतिक दलों के भीतर प्रतिस्पर्धी गुटों को वैधता नहीं देता और ऐसे मामलों को दलबदल विरोधी कानून के संदर्भ में देखा जा सकता है।
अब इस पूरे विवाद पर लोकसभा अध्यक्ष का फैसला आने का इंतजार किया जा रहा है, जिस पर टीएमसी और बागी सांसदों की आगे की राजनीतिक रणनीति काफी हद तक निर्भर करेगी।
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