पश्चिम एशिया संकट के बीच व्हाइट हाउस में ट्रंप-मर्ज की अहम बैठक

पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के माहौल में जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने मंगलवार को व्हाइट हाउस में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात की। ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ की शुरुआत के बाद यह पहली बार है जब किसी यूरोपीय नेता ने ट्रंप से आमने-सामने चर्चा की। इस सैन्य कार्रवाई में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई सहित उनके कई करीबी सहयोगियों के मारे जाने की खबर है।
बैठक के दौरान मर्ज ने कहा कि तेहरान की मौजूदा सत्ता व्यवस्था को हटाने के सवाल पर दोनों देशों के बीच समझ बनी हुई है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि वहां सत्ता परिवर्तन होता है तो उसके बाद की स्थिति पर गंभीरता से विचार जरूरी होगा। दूसरी ओर, राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान में बदलाव की आवश्यकता का जिक्र किया, लेकिन इसे औपचारिक रूप से युद्ध का घोषित लक्ष्य नहीं बताया। अमेरिकी प्रशासन के अन्य वरिष्ठ सदस्यों ने भी इसे आधिकारिक युद्ध उद्देश्य के रूप में पेश नहीं किया है।
मर्ज ने जोर देकर कहा कि मौजूदा संघर्ष जल्द समाप्त होना चाहिए। उन्होंने यूक्रेन के मुद्दे को भी चर्चा का अहम हिस्सा बताया और कहा कि वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए अमेरिका और यूरोप को मिलकर काम करना होगा।
पिछली मुलाकात से अब तक क्या बदला?
चांसलर मर्ज ने पिछले वर्ष जून में पहली बार व्हाइट हाउस में ट्रंप से मुलाकात की थी। उस समय उन्होंने वार्ता को सकारात्मक बताया था। हालांकि, कई मुद्दे अब भी दोनों देशों के बीच चर्चा के केंद्र में हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि अब ईरान को लेकर ताजा सैन्य टकराव ने स्थिति को और संवेदनशील बना दिया है।
व्यापार नीति भी दोनों पक्षों के एजेंडे में फिर से लौट आई है। अमेरिका द्वारा प्रस्तावित नए टैरिफ और उस पर उठे कानूनी सवालों के बाद यूरोपीय संघ ने व्यापार समझौते की पुष्टि की प्रक्रिया फिलहाल रोक दी है। इससे ट्रांस-अटलांटिक आर्थिक संबंधों में अनिश्चितता बनी हुई है।
यूक्रेन में चार साल से अधिक समय से जारी युद्ध भी प्रमुख विषय रहा। ट्रंप प्रशासन का रुख अपने पूर्ववर्ती नेतृत्व की तुलना में अलग माना जा रहा है। रूस के साथ शांति समझौते की कोशिशें अब तक सफल नहीं हो सकी हैं, जबकि शुरुआती प्रस्तावों में रूस को कुछ क्षेत्रों पर नियंत्रण देने की चर्चा सामने आई थी।
इसके अलावा, ग्रीनलैंड को लेकर भी मतभेद उभरते रहे हैं। ट्रंप अपने पिछले कार्यकाल से ही सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए इस क्षेत्र पर अमेरिकी नियंत्रण की इच्छा जता चुके हैं। इस बयानबाजी ने अमेरिका और यूरोप के रिश्तों में तनाव पैदा किया था और नाटो सहयोगियों के बीच भी बहस छेड़ दी थी।
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