EMI समय पर भर रही थी महिला, फिर भी फाइनेंस कंपनी ने जब्त किया ट्रक; अब देने होंगे 17 लाख रुपये

HIGHLIGHTS
- पश्चिम बंगाल राज्य उपभोक्ता आयोग ने फाइनेंस कंपनी को सेवा में कमी का दोषी माना।
- EMI समय पर भरने के बावजूद महिला का ट्रक जब्त करने पर कंपनी को 17.17 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश।
- आयोग ने कहा- बिना बकाया और बिना नोटिस कमर्शियल वाहन जब्त करना गैर-कानूनी है।
- फाइनेंस कंपनी को लोन अकाउंट बंद करने और आगे कोई रिकवरी दावा नहीं करने का निर्देश।
कोलकाता। पश्चिम बंगाल राज्य उपभोक्ता आयोग ने 30 जुलाई को दिए गए एक आदेश में एक फाइनेंस कंपनी को सेवा में कमी का दोषी माना है। कंपनी ने बिना किसी पूर्व सूचना के एक महिला का ट्रक जब्त कर लिया था, जबकि उस लोन पर कोई भुगतान बकाया नहीं था।
आयोग ने इस जब्ती को गैर-कानूनी बताते हुए कंपनी को मुआवजे और कानूनी खर्च के रूप में 17.17 लाख रुपये का भुगतान करने, लोन अकाउंट बंद करने और महिला के खिलाफ आगे कोई रिकवरी दावा नहीं करने का निर्देश दिया है।
महिला ने आयोग का रुख क्यों किया?
आयोग के आदेश के अनुसार, शिकायतकर्ता संपा बसाक ने अगस्त 2017 में फाइनेंस कंपनी से 21.46 लाख रुपये का लोन लेकर एक कमर्शियल ट्रक खरीदा था। इस लोन को 46 मासिक किश्तों में चुकाया जाना था। हर किश्त की राशि 64,641 रुपये थी।
बसाक इस ट्रक का इस्तेमाल सामान ढोने और अपनी आजीविका चलाने के लिए करती थीं। 10 नवंबर 2018 को जब ट्रक नॉर्थ दिनाजपुर में खाद्य उत्पाद लेकर जा रहा था, तभी फाइनेंस कंपनी के कर्मचारियों ने हाईवे पर वाहन को रोककर उसे अपने कब्जे में ले लिया।
बसाक ने बताया कि वह शिकायत दर्ज कराने के लिए स्थानीय पुलिस स्टेशन गईं, लेकिन उनकी शिकायत दर्ज नहीं की गई। इसके बाद उन्होंने उपभोक्ता आयोग में याचिका दायर की और ट्रक के नुकसान, आय के नुकसान, मानसिक परेशानी और कानूनी खर्च के लिए मुआवजे की मांग की।
फाइनेंस कंपनी ने आरोपों से किया इनकार
फाइनेंस कंपनी ने अपने ऊपर लगे आरोपों से इनकार किया। कंपनी ने कहा कि लोन हायर-परचेज एग्रीमेंट के तहत दिया गया था, जिसमें भुगतान में चूक होने पर वाहन वापस लेने का अधिकार था।
कंपनी ने दावा किया कि बसाक बकाया राशि का भुगतान करने में असफल रही थीं और उसने एग्रीमेंट की शर्तों के अनुसार कार्रवाई की थी।
वहीं, आयोग के आदेश में कहा गया, "शिकायतकर्ता के पेमेंट इतिहास से पता चलता है कि सितंबर 2017 में पहली किश्त से लेकर 28.10.2018 तक यानी जबरदस्ती जब्ती से ठीक बारह दिन पहले तक उन्होंने लगातार हर ईएमआई का भुगतान सात दिन की उचित समय-सीमा के भीतर किया था। जब्ती की तारीख (10.11.2018) को संबंधित गाड़ी के लिए उनका बकाया बैलेंस बिल्कुल शून्य था।"
आयोग ने कंपनी को क्यों ठहराया जिम्मेदार?
ज्यूडिशियल मेंबर राजेश गुहा रे और मेंबर शांतनु साहा की बेंच ने कहा कि फाइनेंस कंपनी ट्रक को जब्त नहीं कर सकती थी, क्योंकि वाहन से जुड़े लोन में कोई डिफॉल्ट नहीं हुआ था।
बेंच ने यह भी पाया कि कंपनी यह साबित नहीं कर पाई कि ट्रक का कब्जा लेने से पहले उसने जरूरी लिखित नोटिस दिया था।
आयोग ने कहा कि जब किसी खास संपत्ति पर कोई सक्रिय वित्तीय डिफॉल्ट नहीं है तो फाइनेंसर कब्जा वापस लेने जैसा सख्त कदम नहीं उठा सकता।
कमीशन ने कहा, "जब उधार लेने वाला व्यक्ति समय पर पेमेंट कर रहा हो तब कमर्शियल गाड़ी को जब्त करना बुरी नीयत और सर्विस में भारी कमी का सबूत है।"
आयोग ने यह भी कहा कि भले ही लोन एग्रीमेंट कंपनी को वाहन वापस लेने की अनुमति देता हो, लेकिन उसे उचित प्रक्रिया का पालन करना जरूरी था और पहले नोटिस देना चाहिए था। वाहन ले जाने के बाद भेजा गया नोटिस जब्ती को कानूनी नहीं बना सकता।
बेंच ने कहा, "गाड़ी जब्त करने के तीन दिन बाद 13.11.2018 को भेजा गया लेटर गैर-कानूनी और मनमाने काम को बाद में सही नहीं ठहरा सकता।"
ट्रक की हालत को लेकर भी की गई टिप्पणी
आयोग ने यह भी देखा कि ट्रक करीब आठ साल तक फाइनेंस कंपनी के पास रहा और इस दौरान उसकी अधिकतर वैल्यू खत्म हो गई।
बेंच ने कहा, "शिकायतकर्ता को गाड़ी वापस करना अब कोई काम का समाधान नहीं होगा। यह अब चलने लायक नहीं है और इसे चालू हालत में लाने के लिए मरम्मत और रखरखाव पर भारी खर्च करना होगा।"
कंपनी को देना होगा अलग-अलग मदों में मुआवजा
आयोग ने फाइनेंस कंपनी को निर्देश दिया कि वह शिकायतकर्ता को ट्रक में उसके हिस्से के लिए 8.76 लाख रुपये, आजीविका के नुकसान के लिए 5 लाख रुपये, मानसिक परेशानी और उत्पीड़न के लिए 3 लाख रुपये और कानूनी खर्च के लिए 40 हजार रुपये का भुगतान करे।
इसके अलावा कंपनी को लोन को पूरी तरह चुका हुआ मानने और शिकायतकर्ता के खिलाफ आगे कोई दावा नहीं करने का आदेश दिया गया है।
यह पूरी राशि 45 दिनों के भीतर चुकानी होगी। ऐसा नहीं करने पर भुगतान होने तक इस रकम पर 9 प्रतिशत सालाना ब्याज देना होगा।
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