‘जींस पहनने से लड़के भ्रष्ट होते हैं’ वाली सोच पर हाईकोर्ट सख्त, कहा- पहनावा महिला की निजी पसंद

HIGHLIGHTS
- हाईकोर्ट ने 2014 के ट्रायल कोर्ट के बरी करने के फैसले को पलटा।
- आरोपी को आईपीसी की धारा 354ए(1)(i) के तहत दोषी ठहराया गया।
- मामला जुलाई 2013 में 17 वर्षीय लड़की से जुड़ा था।
नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को एक अहम फैसले में कहा कि किसी महिला या लड़की का पहनावा उसकी निजी पसंद है। अदालत में जिरह के दौरान उसके कपड़ों को उसके चरित्र पर सवाल उठाने या अपराध के लिए उसे जिम्मेदार ठहराने के आधार के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति चंद्रशेखरन सुधा की एकल पीठ ने ट्रायल कोर्ट के 2014 के बरी करने के फैसले को पलटते हुए आरोपी को आईपीसी की धारा 354ए(1)(i) के तहत दोषी करार दिया। यह मामला जुलाई 2013 का है। इसमें एक पड़ोसी पर 17 वर्षीय लड़की का पीछा करने, यौन प्रकृति की टिप्पणियां करने और उसके गाल तथा निजी अंग को छूने का आरोप था।
‘जींस पहनने से लड़के भ्रष्ट होते हैं’ वाली सोच पर कोर्ट सख्त
अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी लड़की या महिला को क्या पहनना है, यह उसकी व्यक्तिगत पसंद का विषय है। न पड़ोसियों, न समाज, न आरोपी और न ही अदालत में पेश होने वाले वकील को यह तय करने का अधिकार है कि किसी महिला को किस तरह के कपड़े पहनने चाहिए।
कोर्ट ने उस सोच को भी अस्वीकार्य बताया, जिसमें जींस पहनने वाली महिला को युवा लड़कों को ‘भ्रष्ट’ करने वाला माना जाता है। न्यायमूर्ति ने कहा कि इसका समाधान महिलाओं और लड़कियों के कपड़ों पर नियंत्रण लगाने में नहीं है। माता-पिता और समाज की जिम्मेदारी है कि बच्चों को अपने व्यवहार पर नियंत्रण रखना, व्यक्तिगत सीमाओं का सम्मान करना और सभी के साथ गरिमा से व्यवहार करना सिखाया जाए।
जिरह में पूछे गए सवालों को बताया अप्रासंगिक
मामले की सुनवाई के दौरान ट्रायल कोर्ट में बचाव पक्ष के वकील ने पीड़िता से उसके पश्चिमी कपड़ों, इलाके के लोगों की आपत्ति और डॉक्टर के पास जाते समय उसने क्या पहन रखा था, जैसे सवाल पूछे थे।
हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे सवाल पीड़िता को शर्मिंदा करने, अपमानित करने और उसके नैतिक आचरण पर सवाल उठाने के उद्देश्य से पूछे गए प्रतीत होते हैं। अदालत ने कहा कि ट्रायल जज को शुरुआत में ही इस तरह के सवालों को रोक देना चाहिए था।
धर्म और परंपरा के तर्क को भी नहीं माना
अदालत ने मामले में धर्म को शामिल करने के प्रयास पर भी कड़ी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि आईपीसी, पॉक्सो एक्ट और अन्य कानून सभी लोगों पर समान रूप से लागू होते हैं, चाहे उनका धर्म कोई भी हो।
अदालत के अनुसार, न तो धर्म और न ही स्थानीय परंपरा किसी गैरकानूनी कृत्य को सही ठहराने या महिला की व्यक्तिगत पसंद पर रोक लगाने का आधार बन सकती है।
अदालतों को जिरह के दौरान सतर्क रहने की सलाह
न्यायमूर्ति सुधा ने कहा कि जब जिरह प्रासंगिक सवालों की सीमा से आगे बढ़कर किसी गवाह को डराने, अपमानित करने या शर्मिंदा करने का जरिया बन जाए, तो अदालत को तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए।
अदालत ने कहा कि न्यायिक कार्यवाही किसी पीड़ित के लिए दोबारा आघात का कारण नहीं बननी चाहिए। आरोपी के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार की सुरक्षा जरूरी है, लेकिन इस अधिकार का इस्तेमाल गवाह की गरिमा को ठेस पहुंचाने के लिए नहीं किया जा सकता।
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