संभल में 101 करोड़ की जमीन मुक्त, 59 साल पुराना कब्जा खत्म

संभल। मुरादाबाद मार्ग स्थित तख्त गुसाई क्षेत्र में ग्राम सभा की लगभग 38 बीघा भूमि को प्रशासन ने कब्जा मुक्त कराते हुए पुनः ग्राम सभा के नाम दर्ज करा दिया है। यह कार्रवाई उपसंचालक चकबंदी न्यायालय के आदेश के बाद पूरी की गई। जिलाधिकारी अंकित खंडेलवाल के अनुसार इस भूमि का अनुमानित बाजार मूल्य करीब 101 करोड़ रुपये है।
जानकारी के मुताबिक, यह जमीन करीब 59 वर्षों से निजी कब्जे में थी। प्रशासन का कहना है कि अधिकांश हिस्सा खाली था, जिस पर कब्जा कर सीमांकन बोर्ड लगाए गए थे। जिन हिस्सों का व्यावसायिक उपयोग हो रहा है, वहां से कब्जा हटाने के लिए संबंधित लोगों को नोटिस जारी किए जाएंगे।
प्रशासन की कार्रवाई और न्यायालय आदेश
डीएम और एसपी कृष्ण कुमार बिश्नोई ने रविवार को मौके पर पहुंचकर स्थिति का निरीक्षण किया था और तत्काल कब्जा हटाने के निर्देश दिए थे। इसके बाद मामला उपसंचालक चकबंदी न्यायालय में पुनर्स्थापना अपील के रूप में प्रस्तुत किया गया, जिसे 3 जून 2026 को दायर किया गया था।
न्यायालय ने नियमित सुनवाई के बाद 27 जून 2026 को आदेश पारित करते हुए भूमि को ग्राम सभा के नाम दर्ज करने का निर्णय दिया। इसमें गाटा संख्या 206, 207, 233, 242/378 और 279 शामिल हैं। आदेश के बाद भूमि को सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
कथित पट्टे पर विवाद
प्रशासनिक जांच में सामने आया कि वर्ष 1954 के शासनादेश के अनुसार मौजा तख्त गुसाई को गैर आबाद घोषित कर इसका प्रबंधन नगर पालिका संभल को सौंपा गया था। हालांकि, यह क्षेत्र नगर पालिका सीमा से बाहर था।
सईदुल रहमान पक्ष द्वारा दावा किया गया कि वर्ष 1967 में तत्कालीन पालिका अध्यक्ष ने उन्हें भूमि का पट्टा दिया था, लेकिन जांच में यह पट्टा नियमों के विपरीत पाया गया। नगर पालिका अधिनियम के अनुसार बिना शासन अनुमति के भूमि हस्तांतरण अवैध माना जाता है, और एक वर्ष से अधिक का पट्टा भी मान्य नहीं है।
हाईकोर्ट में लंबित मामला और जांच
डीएम के अनुसार, यह प्रकरण इलाहाबाद हाईकोर्ट में 2008 से विचाराधीन है। वर्ष 2013 में कुछ प्रक्रियात्मक बदलावों के बाद मामला पुनः सक्रिय किया गया है और अब सुनवाई जारी है।
तहसील स्तर पर वर्ष 1991 में अवैध कब्जा श्रेणी से नाम हटाने का आदेश दिया गया था, जिसे 1992 में एडीएम स्तर पर भी सही माना गया था। बाद में चकबंदी प्रक्रिया के दौरान पट्टे के आधार पर नाम दर्ज कराने का प्रयास किया गया, जिसे प्रशासन ने अस्वीकार कर दिया।
फर्जी दस्तावेज और आगे की कार्रवाई
प्रशासनिक जांच में पाया गया कि कथित पट्टा वैधानिक अधिकार के बिना जारी किया गया था और इसके प्रमाण भी रिकॉर्ड में उपलब्ध नहीं हैं। न्यायालय ने इसे संदिग्ध और कपटपूर्ण तथ्यों पर आधारित पाया।
अधिकारियों के अनुसार, इस पूरे मामले में कुछ पूर्व अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका की भी जांच की जा रही है। उपसंचालक चकबंदी न्यायालय ने 25 दिनों के भीतर सुनवाई पूरी करते हुए भूमि को ग्राम सभा के नाम दर्ज करने का आदेश दिया।
जिलाधिकारी ने स्पष्ट किया कि व्यावसायिक उपयोग वाली जमीन को भी खाली कराया जाएगा और अवैध कब्जाधारकों के खिलाफ आगे भी कार्रवाई जारी रहेगी।
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