संसदीय समिति ने NTA से पूछी ‘पेपर लीक’ की परिभाषा, CBSE से OSM पर जवाब तलब

नई दिल्ली। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) की परीक्षा प्रणाली और उसकी पारदर्शिता को लेकर संसद की एक समिति ने कई अहम सवाल उठाए हैं। समिति ने एनटीए से यह स्पष्ट करने को कहा है कि उसकी परिभाषा में ‘पेपर लीक’ किसे माना जाएगा और वर्ष 2018 के बाद आयोजित परीक्षाओं में ऐसी किसी घटना की पुष्टि हुई है या नहीं।
सूत्रों के मुताबिक, हाल ही में समिति के सामने एनटीए अधिकारियों की पेशी के बाद यह विस्तृत प्रश्नावली तैयार की गई है। सुनवाई के दौरान अधिकारियों ने दावा किया था कि अब तक किसी भी परीक्षा में वास्तविक पेपर लीक नहीं हुआ है और जिन मामलों की चर्चा होती है, वे केवल “गेस पेपर” से जुड़े प्रश्नों के पहले से सार्वजनिक होने तक सीमित हैं।
कांग्रेस सांसद दिग्विजय सिंह की अध्यक्षता वाली शिक्षा, महिला, बाल, युवा और खेल संबंधी संसदीय समिति इस समय नीट-यूजी पेपर विवाद और सीबीएसई के ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) सिस्टम से जुड़े मामलों की जांच कर रही है। इसके तहत एनटीए और सीबीएसई दोनों एजेंसियों से विस्तृत जवाब तलब किए गए हैं।
समिति ने एनटीए से यह भी पूछा है कि क्या नीट-यूजी 2024 से जुड़े अनियमितता के आरोपों पर सीबीआई जांच के अलावा कोई आंतरिक जांच कराई गई थी। साथ ही पिछले तीन वर्षों की कर्मचारी संख्या, 2022 के बाद हुई नई भर्तियों और वार्षिक रिपोर्ट की प्रतियां भी मांगी गई हैं।
सूत्रों के अनुसार, समिति ने इसरो के पूर्व प्रमुख के. राधाकृष्णन की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञ समिति की 101 सिफारिशों पर एनटीए द्वारा की गई कार्रवाई का विस्तृत ब्योरा भी तलब किया है। यह समिति जून 2024 में गठित की गई थी, जिसका उद्देश्य परीक्षा प्रणाली को अधिक पारदर्शी और सुरक्षित बनाना था।
सीबीएसई और एनटीए दोनों को अलग-अलग समयसीमा में जवाब देने के निर्देश दिए गए हैं। सीबीएसई को 8 जून तक और एनटीए को 10 जून तक लिखित उत्तर सौंपना होगा। हालांकि सूत्रों का कहना है कि अभी तक दोनों संस्थाओं की ओर से कोई औपचारिक जवाब नहीं मिला है।
इसके अलावा समिति ने सीबीएसई के ओएसएम सिस्टम से जुड़े टेंडर प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए हैं। इसमें आरएफपी में किए गए बदलाव, बोलीदाताओं की योग्यता से जुड़े नियमों में संशोधन, कंपनी के न्यूनतम टर्नओवर मानदंड और स्कैनिंग रिजॉल्यूशन में बदलाव जैसे तकनीकी पहलुओं पर स्पष्टीकरण मांगा गया है।
समिति ने यह भी जानना चाहा है कि क्या टेंडर देने से पहले संबंधित कंपनी की पृष्ठभूमि की उचित जांच की गई थी और क्या उसके पिछले रिकॉर्ड को ध्यान में रखा गया था।
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