शुकतीर्थ में स्थापित हो श्रीमद्भागवत महापुराण शोध केंद्र, संस्कृत विद्वानों की मांग

मोरना/शुकतीर्थ। गीता जयंती के अवसर पर भागवत पीठ श्री शुकदेव आश्रम में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में देशभर से आए संस्कृत विद्वानों ने संस्कृत के संरक्षण और प्रसार पर गहन चर्चा की। विद्वानों ने पीठाधीश्वर स्वामी ओमानंद महाराज को सुझाव दिया कि शुकतीर्थ में ‘श्रीमद्भागवत महापुराण शोध एवं अध्ययन केंद्र’ की स्थापना की जाए, जिससे शोध कार्यों को नई दिशा मिल सके।
कार्यक्रम की शुरुआत में संस्कृत के आचार्यों, विद्वानों और शोधार्थियों का पारंपरिक रूप से स्वागत हुआ। सारनाथ, वाराणसी से आए केंद्रीय तिब्बती विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग प्रमुख धर्मदत्त चतुर्वेदी ने कहा कि संस्कृत किसी विशेष जाति, वर्ग या क्षेत्र की भाषा नहीं, बल्कि पूरे भारत की सांस्कृतिक आत्मा है। उन्होंने कहा कि भारतीय शिक्षा प्रणाली में संस्कृत को वह सम्मान मिलना चाहिए, जिसका वह स्वाभाविक रूप से हकदार है।
उन्होंने कहा कि युवा पीढ़ी को संस्कृत से जोड़ने पर ही सनातन परंपरा और प्राचीन भारतीय ज्ञान की गहराई को समझा जा सकेगा।
संत कबीर नगर स्थित हिंदी संस्कृत महाविद्यालय के डॉ. इंद्रेश कुमार पांडेय ने बताया कि सरकारें और संस्थाएँ संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए कार्य कर रही हैं, लेकिन संस्कृत विद्यालय आज भी छात्रों की कमी से जूझ रहे हैं, जो बड़ी चिंता का विषय है।
राजकीय पीजी कॉलेज मुहम्मदाबाद, गोहाना मऊ के सहायक आचार्य एवं संगोष्ठी संयोजक डॉ. चंद्रकांत दत्त शुक्ल ने कहा कि संस्कृत ज्ञान-विज्ञान, राष्ट्रीय भावना और सामाजिक एकता की सबसे प्राचीन और समृद्ध भाषा है, जो हमें अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करना सिखाती है।
लखनऊ से प्रोफेसर रीता तिवारी एवं सौरभ तिवारी, प्रयागराज से डॉ. तेज प्रकाश, चंदौली से डॉ. रविकांत भारद्वाज और वाराणसी से आशीष मणि त्रिपाठी ने भी अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम में प्रधानाचार्य जीसी उप्रेती, कथा व्यास अचल कृष्ण शास्त्री, आचार्य अतुल, ठाकुर प्रसाद, दीपक मिश्रा आदि उपस्थित रहे। संचालन ट्रस्टी ओमदत्त देव ने किया।
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