सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: सहमति से बने संबंध को चरित्रहीनता नहीं माना जा सकता

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना पुलिस कॉन्स्टेबल भर्ती से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दो आपसी सहमति से बने अविवाहित बालिगों के बीच संबंध को केवल इस आधार पर किसी व्यक्ति के चरित्र पर सवाल उठाने का कारण नहीं बनाया जा सकता।
चयन रद्द करने का फैसला पलटा
तेलंगाना स्टेट लेवल पुलिस रिक्रूटमेंट बोर्ड द्वारा एक उम्मीदवार का प्रोविजनल चयन रद्द किए जाने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने गलत ठहराते हुए पलट दिया। मामला 2014 में दर्ज एक आपराधिक केस से जुड़ा था, जिसमें शादी का झूठा वादा कर संबंध बनाने का आरोप लगाया गया था। बाद में यह मामला 2015 में लोक अदालत में समझौते के जरिए समाप्त हो गया था। उम्मीदवार ने भर्ती फॉर्म में इस पूरी जानकारी का उल्लेख किया था।
‘नैतिकता के आधार पर निष्कर्ष गलत’
जस्टिस मनमोहन और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि केवल समझौते या पुराने आरोपों के आधार पर उम्मीदवार की नैतिकता पर सवाल खड़ा करना उचित नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि दो सहमति से बने वयस्कों के बीच शारीरिक संबंध को चरित्रहीनता का आधार नहीं माना जा सकता, और ऐसा कोई कानून नहीं है जो वयस्कों को अपनी इच्छा से संबंध बनाने से रोकता हो।
हर रिश्ता शादी में बदलना जरूरी नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि हर रिश्ता शादी तक नहीं पहुंचता, इसलिए केवल रिश्ते के समाप्त होने को धोखाधड़ी मान लेना गलत है। अदालत ने कहा कि यदि रिश्ता शादी में नहीं बदलता, तो इसे अपने आप में अपराध या छल नहीं माना जा सकता।
पड़ोसी होने और लंबे संबंधों पर गौर
पीठ ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए पाया कि उम्मीदवार और शिकायतकर्ता पड़ोसी थे और लंबे समय से एक-दूसरे को जानते थे। मामले में यह साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत नहीं मिला कि समझौता दबाव में किया गया था।
कोर्ट ने यह भी कहा कि धोखाधड़ी के आरोप केवल शिकायतकर्ता के बयान पर आधारित थे, जो आगे केस नहीं बढ़ाना चाहती थीं, इसलिए भर्ती बोर्ड के पास चरित्र पर संदेह करने का कोई मजबूत आधार नहीं था।
नियोक्ताओं के लिए अहम संदेश
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह सिद्धांत भी स्पष्ट किया कि किसी भी उम्मीदवार के खिलाफ नकारात्मक निष्कर्ष तभी निकाला जा सकता है जब ठोस और विश्वसनीय सबूत मौजूद हों कि अपराध साबित हुआ है।
इस फैसले के साथ कोर्ट ने भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता को प्राथमिकता देते हुए उम्मीदवार के चयन रद्द करने के आदेश को रद्द कर दिया।
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