दिल्ली दंगों के मामले में ताहिर हुसैन को 2 साल की सजा, 10 हजार रुपये का जुर्माना

HIGHLIGHTS
- कड़कड़डूमा अदालत के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश परवीन सिंह ने सजा संबंधी आदेश जारी किया।
- ताहिर हुसैन को आईपीसी की धारा 147 और धारा 109 के तहत दंडनीय अपराधों में दोषी ठहराया गया था।
- अभियोजन पक्ष ने दंगों से जुड़े एक अन्य मामले में भी दोषी ठहराए जाने का हवाला दिया।
दिल्ली की एक अदालत ने फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों से जुड़े मामले में आम आदमी पार्टी के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन को दो साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। शुक्रवार को सजा सुनाते हुए अदालत ने टिप्पणी की कि हिंसा का निर्देश देने वाला व्यक्ति भी उतना ही दोषी है, जितना उसे अंजाम देने वाला। अदालत ने कहा कि निर्वाचित जनप्रतिनिधि होने के नाते ताहिर हुसैन का पद और हिंसा को बढ़ावा देने के लिए उनके घर का इस्तेमाल किया जाना, अपराध की गंभीरता बढ़ाने वाले अहम पहलू थे।
कड़कड़डूमा अदालत के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश परवीन सिंह ने ताहिर हुसैन पर 10 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया। अदालत के मुताबिक, अभियोजन पक्ष की ओर से अपराध की गंभीरता बढ़ाने के लिए पेश किए गए तथ्य, बचाव पक्ष की ओर से सजा कम करने के समर्थन में दी गई दलीलों पर भारी पड़े।
16 अक्टूबर को जारी सजा संबंधी आदेश में अदालत ने कहा कि सांप्रदायिक तनाव के दौरान ताहिर हुसैन से अपेक्षा थी कि वह लोगों को हिंसा से रोकने और शांति एवं सद्भाव बनाए रखने के लिए प्रयास करते। इसके विपरीत, अदालत ने उन्हें दंगों को बढ़ावा देने का दोषी पाया। अदालत के अनुसार, उन्होंने अपना घर उपलब्ध कराया, जिसे इलाके का सबसे ऊंचा स्थान बताया गया। वहां से दंगाई लोगों पर हमला करने और संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने की स्थिति में थे।
अदालत ने टिप्पणी की कि जिस पद का इस्तेमाल हिंसा रोकने के लिए किया जाना चाहिए था, उसका इस्तेमाल इस मामले में हिंसा को बढ़ावा देने के लिए हुआ। अदालत ने कहा कि उनका यह आचरण अपराध की गंभीरता के अनुरूप सजा देने और भविष्य में इस तरह के कृत्यों को रोकने के लिए निवारक दंड की जरूरत को दर्शाता है।
ताहिर हुसैन को 10 अक्टूबर को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 147 के साथ धारा 109 के तहत दंडनीय अपराधों में दोषी ठहराया गया था। ये धाराएं दंगा करने और दंगे के लिए उकसाने से संबंधित हैं। सजा का यह आदेश दयालपुर थाने में दर्ज प्राथमिकी संख्या 120/2020 से जुड़ा है।
अभियोजन पक्ष ने अधिकतम सजा देने की मांग की
अभियोजन पक्ष ने अदालत से कानून के तहत निर्धारित अधिकतम सजा देने का आग्रह किया था। उसने दलील दी कि ताहिर हुसैन को दंगों से जुड़े एक अन्य मामले में भी दोषी ठहराया जा चुका है, इसलिए वह बार-बार अपराध करने वाले व्यक्ति हैं।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, खजूरी खास और करावल नगर रोड इलाके में हिंसा के दौरान ताहिर हुसैन का घर एक प्रमुख केंद्र के रूप में इस्तेमाल किया गया था। वहां से दंगाइयों को आम लोगों पर हमला करने के लिए ऊंचाई और अनुकूल स्थिति मिलती थी। अभियोजन पक्ष ने यह भी कहा कि उस समय निर्वाचित जनप्रतिनिधि होने के कारण ताहिर हुसैन की जिम्मेदारी हिंसा रोकने की थी, न कि उसे बढ़ावा देने की।
बचाव पक्ष ने क्या दलीलें दीं?
कठोर सजा की मांग का विरोध करते हुए ताहिर हुसैन के वकील ने कहा कि उन्हें आईपीसी की धारा 149 के तहत दोषी नहीं ठहराया गया था। साथ ही, यह भी नहीं पाया गया कि उन्होंने दंगाइयों की भीड़ में शामिल होकर सीधे तौर पर हिंसा की थी। बचाव पक्ष ने दलील दी कि ताहिर हुसैन के किसी प्रत्यक्ष कृत्य को साबित नहीं किया गया। उन्होंने लगातार दावा किया था कि दंगाइयों ने जबरन उनके घर पर कब्जा कर लिया था।
वकील ने यह भी बताया कि घटना के दौरान ताहिर हुसैन ने पुलिस नियंत्रण कक्ष (पीसीआर) को फोन किया था। बचाव पक्ष के मुताबिक, उन्हें दंगाइयों की जानबूझकर मदद करने के बजाय हिंसा को सुविधाजनक बनाने के आधार पर दोषी ठहराया गया था। इसी आधार पर अदालत से उनके प्रति नरम रुख अपनाने की अपील की गई।
सीधे हिंसा में शामिल नहीं होना सजा घटाने का आधार नहीं
अदालत ने सजा कम करने के लिए दी गई दलीलों को स्वीकार नहीं किया। उसने कहा कि भीड़ में सीधे तौर पर शामिल नहीं होने का तथ्य अपने आप में उस अपराध की गंभीरता को काफी कम नहीं करता, जिसके लिए ताहिर हुसैन को दोषी ठहराया गया है।
न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि अभियोजन पक्ष यदि दोषी की दंगे में सक्रिय भागीदारी साबित नहीं कर पाया, तो केवल इस आधार पर उसके आचरण की गंभीरता कम नहीं हो जाती।
अदालत ने ताहिर हुसैन की बेबसी से जुड़ी दलील को भी सजा कम करने का स्थापित आधार मानने से इनकार कर दिया। अदालत के अनुसार, ताहिर हुसैन ने बचाव में साक्ष्य पेश करने का विकल्प चुना था, लेकिन वह कथित पीसीआर कॉल किए जाने को साबित नहीं कर सके और न ही अपने बचाव के समर्थन में कोई अन्य साक्ष्य प्रस्तुत कर पाए।
अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि जब ताहिर हुसैन से पूछा गया कि क्या उन्होंने किसी ज्ञात या अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी कि उनके घर पर जबरन कब्जा कर उसका इस्तेमाल दंगा करने और पत्थरबाजी के लिए किया गया, तो उन्होंने नकारात्मक जवाब दिया।
हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि इससे निर्णायक रूप से यह साबित नहीं होता कि घर पर जबरन कब्जा नहीं किया गया था। फिर भी, उसने इसे घटना के बाद ताहिर हुसैन के आचरण से जुड़ा तथ्य माना। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है, जिसके आधार पर इस दलील को सजा कम करने वाली परिस्थिति माना जा सके।
‘सुविधा देने’ का मतलब आपराधिक मंशा का अभाव नहीं
अदालत ने बचाव पक्ष की उस दलील को भी खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि ताहिर हुसैन को हिंसा में मदद करने की मंशा के बिना केवल सुविधा उपलब्ध कराने के आधार पर दोषी ठहराया गया। अदालत ने कहा कि फैसले में ‘सुविधा प्रदान करने’ शब्द के इस्तेमाल से आवश्यक आपराधिक मंशा खत्म नहीं हो जाती। ऐसे आचरण को अपने आप कम दोषपूर्ण भी नहीं माना जा सकता।
सामाजिक-आर्थिक रिपोर्ट में करीब दो लाख रुपये मासिक आय का उल्लेख
सजा संबंधी आदेश में अदालत ने सामाजिक-आर्थिक रिपोर्ट का भी जिक्र किया। रिपोर्ट के मुताबिक, ताहिर हुसैन ने दसवीं कक्षा तक पढ़ाई की थी। वह विवाहित हैं और उनके परिवार में चार आश्रित सदस्य हैं। उनकी मासिक आय लगभग दो लाख रुपये बताई गई थी। रिपोर्ट में उनके खिलाफ पहले से नौ मामलों में संलिप्तता का भी उल्लेख था।
अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि बचाव पक्ष सजा कम करने के समर्थन में बताई गई परिस्थितियों को साबित नहीं कर सका। इसके उलट, अपराध की गंभीरता बढ़ाने वाले तथ्य अधिक प्रभावी रहे। अदालत ने कहा कि कम सजा देने का कोई पर्याप्त आधार नहीं है।
इसके बाद अदालत ने ताहिर हुसैन को दो साल के कठोर कारावास और 10 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। जुर्माना नहीं भरने की स्थिति में उन्हें 10 दिन का साधारण कारावास भुगतना होगा। आदेश में कानूनी प्रावधानों के तहत पहले से हिरासत में बिताई गई अवधि को सजा में समायोजित करने का लाभ भी दिया गया है।
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