बायोफ्यूल की बढ़ती मांग से महंगा हो सकता है खाद्य तेल, कीमतों में 20% तक उछाल की संभावना

HIGHLIGHTS
- सीपीओपीसी के मुताबिक, वैश्विक वनस्पति तेल का 27% हिस्सा बायोफ्यूल बनाने में इस्तेमाल हो रहा है।
- इंडोनेशिया ने पेट्रोल-डीजल में 50% बायोफ्यूल मिलाने वाला बी50 नियम लागू किया है।
- मलेशिया ने 2030 तक पेट्रोल-डीजल में 30% बायोफ्यूल मिलाने का लक्ष्य रखा है।
नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी संकट और रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आ रही है। इसका असर अब खाद्य तेल की कीमतों पर भी पड़ने की आशंका है। काउंसिल ऑफ पाम ऑयल प्रोड्यूसिंग कंट्रीज (सीपीओपीसी) के अनुसार, वैश्विक स्तर पर वनस्पति तेल का 27 प्रतिशत हिस्सा अब बायोफ्यूल बनाने में इस्तेमाल हो रहा है। इसमें मुख्य रूप से पाम ऑयल और सोयाबीन तेल शामिल हैं।
पिछले एक साल में खाद्य तेल की कीमतें 20 प्रतिशत तक बढ़ चुकी हैं और आगे भी इनके बढ़ने की आशंका है। वनस्पति तेल महंगा होने का असर केवल रसोई में इस्तेमाल होने वाले तेल तक सीमित नहीं रहता। साबुन, तेल, टूथपेस्ट, बिस्कुट और कई अन्य एफएमसीजी उत्पादों की निर्माण लागत भी बढ़ जाती है, क्योंकि इनमें पाम ऑयल का इस्तेमाल होता है। खाद्य तेल की कीमतों को काबू में रखने के लिए सरकार ने पिछले साल सितंबर में पाम ऑयल के आयात शुल्क में कटौती भी की थी।
क्यों बढ़ सकती हैं खाद्य तेल की कीमतें?
पश्चिम एशिया संकट का समाधान नहीं निकलने और वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता बढ़ने के बीच पाम ऑयल और सोयाबीन के प्रमुख उत्पादक देश अपनी ईंधन जरूरतों को सुरक्षित करने में जुटे हैं। ईरान-अमेरिका युद्ध से पहले कच्चे तेल की कीमत करीब 65 डॉलर प्रति बैरल थी, जो अब 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई है। ऐसे में पाम ऑयल और सोयाबीन जैसे खाद्य तेलों का इस्तेमाल बायोडीजल और बायोफ्यूल बनाने में बढ़ रहा है। वैश्विक बायोफ्यूल बाजार हर साल 6.5 प्रतिशत की दर से विस्तार कर रहा है।
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच इंडोनेशिया ने अपने यहां बी50 नियम लागू कर दिया है। इसके तहत पाम ऑयल से बायोफ्यूल तैयार किया जाएगा और पेट्रोल-डीजल में 50 प्रतिशत तक बायोफ्यूल मिलाया जाएगा। इससे इंडोनेशिया को कच्चे तेल के आयात पर खर्च होने वाले करीब आठ अरब डॉलर की बचत होने का अनुमान है।
इंडोनेशिया दुनिया का सबसे बड़ा पाम ऑयल उत्पादक देश है और भारत अपनी पाम ऑयल की सबसे अधिक खरीदारी इसी देश से करता है। इंडोनेशिया के बाद भारत को पाम ऑयल की आपूर्ति करने वाला दूसरा प्रमुख देश मलेशिया है। मलेशिया ने वर्ष 2030 तक पेट्रोल-डीजल में 30 प्रतिशत तक बायोफ्यूल मिलाने का लक्ष्य तय किया है। इसके चलते वहां से पाम ऑयल की आपूर्ति भी प्रभावित होने लगी है।
सोयाबीन के प्रमुख उत्पादक ब्राजील और अर्जेंटीना में भी इससे बायोफ्यूल तैयार किया जा रहा है। ब्राजील में तो 100 प्रतिशत तक बायोफ्यूल का इस्तेमाल किया जा रहा है। वहीं, पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों से बचने के लिए अमेरिका ने भी बायोफ्यूल उत्पादन में सोयाबीन और मक्के का इस्तेमाल बढ़ा दिया है।
जानकारों के मुताबिक, जिन देशों के पास बायोफ्यूल बनाने के लिए जरूरी कच्चा माल उपलब्ध नहीं है, उनके लिए यह पेट्रोल-डीजल की तुलना में महंगा विकल्प साबित हो सकता है। इसके विपरीत, पाम ऑयल, सोयाबीन या मक्के जैसे कच्चे माल वाले देशों के लिए बायोफ्यूल अपेक्षाकृत सस्ता विकल्प है। भारत भी मक्के से एथनॉल बनाकर पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथनॉल का इस्तेमाल कर रहा है।
चीन में सीपीओपीसी की बैठक में होगा खाद्य तेल के इस्तेमाल पर विचार
काउंसिल ऑफ पाम ऑयल प्रोड्यूसिंग कंट्रीज (सीपीओपीसी) अक्टूबर के अंत में चीन में बैठक करने जा रही है। इसमें बायोफ्यूल बनाने के लिए खाद्य तेल के बढ़ते इस्तेमाल पर चर्चा की जाएगी।
जानकारों का कहना है कि इस बार भारत में सोयाबीन का उत्पादन भी कम है। अनुमान है कि भारत अगले नवंबर से शुरू होने वाले तेल सीजन में करीब 56 लाख टन सोयाबीन तेल का आयात करेगा। ब्राजील और अर्जेंटीना में बायोफ्यूल उत्पादन के लिए सोयाबीन का इस्तेमाल बढ़ने से इसकी कीमत पिछले एक साल में 15 प्रतिशत से अधिक बढ़ चुकी है।
पिछले साल नवंबर से इस साल सितंबर तक भारत ने कुल 155 लाख टन वनस्पति तेल का आयात किया। इसमें पाम, सूरजमुखी, रेपसीड और अन्य प्रकार के तेल शामिल हैं। पाम और सोयाबीन तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर सरसों सहित दूसरे खाद्य तेलों के दाम पर भी पड़ता है।
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