'हमें रिव्यू करने का अधिकार', सबरीमाला केस में एससी की अहम टिप्पणी

नई दिल्ली। सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर चल रही सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि वह यह तय कर सकती है कि कोई धार्मिक प्रथा अंधविश्वास है या नहीं, और इस मामले में केवल संसद का निर्णय अंतिम नहीं माना जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसकी अध्यक्षता न्यायमूर्ति सूर्यकांत कर रहे थे, ने कहा कि किसी प्रथा को अंधविश्वास मानना अदालत का अधिकार है। इसके बाद उस प्रथा पर कार्रवाई के लिए संसद या अन्य निकाय कदम उठा सकते हैं, लेकिन अदालत के अधिकार को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
यह टिप्पणी उस समय आई जब 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर रोक को लेकर बहस चल रही थी। मामला महिलाओं के अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता के संतुलन से जुड़ा है। अदालत ने सती प्रथा, जादू-टोना और नरभक्षण जैसे उदाहरण भी पेश किए और कहा कि यदि कोई प्रथा समाज को प्रभावित करती है या झकझोरती है, तो अदालत हस्तक्षेप कर सकती है।
सरकार और अदालत के दृष्टिकोण में अंतर
सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि धर्मनिरपेक्ष अदालत यह तय नहीं कर सकती कि कोई प्रथा अंधविश्वास है या नहीं, क्योंकि अदालत को धार्मिक ज्ञान नहीं होता। उन्होंने यह भी कहा कि अलग-अलग राज्यों और समाजों में धार्मिक मान्यताएं भिन्न होती हैं, इसलिए जो एक जगह धार्मिक है, वह दूसरी जगह अंधविश्वास माना जा सकता है।
इस पर जजों ने सवाल उठाया कि यदि कोई प्रथा जादू-टोना जैसी हो और उसे धर्म का हिस्सा कहा जाए, तो क्या इसे अंधविश्वास नहीं माना जाएगा।
अदालत के अधिकार पर जोर
जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि यदि कानून स्पष्ट नहीं है, तो क्या अदालत हस्तक्षेप नहीं कर सकती। उन्होंने बताया कि अदालत सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के आधार पर हस्तक्षेप कर सकती है।
तुषार मेहता ने जवाब दिया कि अदालत हस्तक्षेप कर सकती है, लेकिन केवल अंधविश्वास के आधार पर नहीं, बल्कि सार्वजनिक व्यवस्था और नैतिकता को ध्यान में रखते हुए। जस्टिस एमएम सुंदरेश ने भी कहा कि सरकार यह नहीं कह सकती कि अदालत के पास अधिकार नहीं है। यदि कोई प्रथा सती जैसी हानिकारक हो, तो अदालत दखल दे सकती है।
‘जरूरी धार्मिक प्रथा’ पर विचार
जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि अदालत को यह तय करना होगा कि कोई प्रथा उस धर्म के लिए ‘अनिवार्य’ है या नहीं। यह निर्णय धर्म की परंपरा और सोच के आधार पर होना चाहिए, न कि किसी दूसरे धर्म के नजरिए से। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह सब सार्वजनिक व्यवस्था और नैतिकता के दायरे में ही होना चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश ने भी कहा कि अदालत धार्मिक विशेषज्ञ नहीं है, लेकिन अगर कोई प्रथा बहुत हानिकारक लगे, जैसे नरबलि या जादू-टोना, तो अदालत सीधे हस्तक्षेप कर सकती है।
सरकार का पक्ष
सरकार का कहना है कि सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक भेदभाव नहीं, बल्कि भगवान अयप्पा की धार्मिक मान्यता से जुड़ी है, जिन्हें ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ माना जाता है। सरकार ने यह भी कहा कि धार्मिक परंपराओं को केवल व्यक्तिगत अधिकार या समानता के नजरिए से नहीं देखा जा सकता, बल्कि हर धर्म की मान्यताओं का सम्मान होना चाहिए।
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