धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार में सार्वजनिक अवकाश की मांग शामिल नहीं: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने धार्मिक अवसर पर सार्वजनिक अवकाश की घोषणा की मांग को खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार किसी धार्मिक अवसर पर सार्वजनिक अवकाश घोषित करने का अधिकार नहीं देता। सार्वजनिक अवकाश घोषित करना सरकार का नीतिगत निर्णय है, जिसमें न्यायालय का हस्तक्षेप उचित नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि विकासशील राष्ट्र के रूप में भारत को उत्पादकता और काम की निरंतरता को प्राथमिकता देनी चाहिए। इसी तर्क के आधार पर, दसवें सिख गुरु, गुरु गोविंद सिंह जी की जयंती (प्रकाश पर्व) को पूरे देश में राजपत्रित अवकाश घोषित करने की मांग को खारिज कर दिया गया।
गुरु गोविंद सिंह की जीवन गाथा और संदेश
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि सिख धर्म के सिद्धांत स्मरण, ईमानदार श्रम और नि:स्वार्थ सेवा पर जोर देते हैं। गुरु गोविंद सिंह जी का जीवन साहस, अनुशासन और कर्तव्य के प्रति अटूट प्रतिबद्धता का उदाहरण है। अदालत ने कहा कि उनके प्रति सम्मान व्यक्त करने का सबसे उत्तम तरीका यह है कि समाज और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन पूरी निष्ठा से किया जाए, न कि केवल प्रतीकात्मक अवकाश मांगकर सम्मान जताया जाए।
याचिका और अदालत का तर्क
ऑल इंडिया शिरोमणि सिंह सभा की याचिका को न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने खारिज किया। अदालत ने कहा कि याचिका में सम्मान की भावना भले ही सराहनीय हो, लेकिन यह अनुच्छेद 32 के तहत न्यायिक हस्तक्षेप का आधार नहीं बनती।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक अवकाश घोषित करना पूरी तरह कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में आता है। अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार व्यक्ति को अपने धर्म का पालन, मानने और प्रचार करने तक सीमित है, न कि किसी धार्मिक अवसर को पूरे देश में अवकाश घोषित कराने तक।
संघीय संरचना और भिन्नता का महत्व
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारत की संघीय संरचना राज्यों को अलग-अलग निर्णय लेने की अनुमति देती है। सार्वजनिक अवकाशों का निर्धारण स्थानीय आवश्यकताओं और सांस्कृतिक कारकों के आधार पर किया जाता है। अदालत ने यह भी माना कि अलग-अलग राज्यों में छुट्टियां देने में भेदभाव नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि यह मांग मान ली गई तो अलग-अलग धार्मिक और सामाजिक समूहों से इसी तरह की मांगों की बाढ़ आ सकती है। इससे सार्वजनिक अवकाशों का अव्यवहारिक विस्तार होगा और शासन तथा प्रशासनिक कामकाज पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
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