सांवलियाजी मंदिर के भंडार से निकले 31.17 करोड़ रुपये, पांच चरणों में पूरी हुई गिनती

HIGHLIGHTS
- भंडार की नकदी की गणना पांच चरणों में पूरी हुई।
- पांचवें चरण में 44.22 लाख रुपये की राशि मिली।
- दानपेटियों से कुल 23.58 करोड़ रुपये प्राप्त हुए।
चित्तौड़गढ़। जिले के प्रसिद्ध कृष्णधाम श्री सांवलियाजी मंदिर में भगवान के भंडार से प्राप्त दानराशि की गणना पांचवें और अंतिम चरण के साथ संपन्न हो गई। पांचों चरणों की गणना के बाद कुल 31 करोड़ 17 लाख 92 हजार 129 रुपये की दानराशि सामने आई। अंतिम चरण में भंडार से 44 लाख 22 हजार 718 रुपये की नकदी प्राप्त हुई।
भंडार की गणना के पहले चरण में 9 करोड़ 35 लाख 65 हजार 100 रुपये की राशि मिली थी। इसके बाद दूसरे चरण में 5 करोड़ 94 लाख 35 हजार रुपये और तीसरे चरण में 6 करोड़ 10 लाख 12 हजार रुपये की गणना की गई। चौथे चरण में 1 करोड़ 74 लाख 10 हजार रुपये प्राप्त हुए। पांचवें चरण में 44 लाख 22 हजार 718 रुपये की गिनती के साथ भंडार से मिली नकदी की गणना पूरी हो गई।
भंडार की दानपेटियों से मिले 23.58 करोड़ रुपये
पांच चरणों में मंदिर के भंडार की दानपेटियों से कुल 23 करोड़ 58 लाख 44 हजार 818 रुपये प्राप्त हुए। इसके अलावा भेंटकक्ष और अन्य माध्यमों से भी श्रद्धालुओं ने भगवान के दरबार में दान अर्पित किया।
भेंटकक्ष से कुल 930 ग्राम 100 मिलीग्राम सोना प्राप्त हुआ। श्रद्धालुओं की ओर से भेंट किए गए सोने के आभूषण मंदिर में आने वाले भक्तों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहते हैं।
इसी तरह भगवान सांवलियाजी के भेंटकक्ष से कुल 92 किलो 242 ग्राम 320 मिलीग्राम चांदी भी प्राप्त हुई। सोने और चांदी के आभूषण श्रद्धालुओं की आस्था और श्रद्धा को प्रदर्शित करते हैं।
ऑनलाइन और अन्य माध्यमों से 7.59 करोड़ रुपये का दान
मनीऑर्डर, ऑनलाइन माध्यमों और भेंट के जरिए कुल 7 करोड़ 59 लाख 47 हजार 311 रुपये की दानराशि प्राप्त हुई। इन माध्यमों से देश के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले श्रद्धालु भी भगवान के दरबार में अपना योगदान देते हैं।
भंडार की दानपेटियों, ऑनलाइन माध्यमों, मनीऑर्डर और अन्य भेंट से प्राप्त राशि को मिलाकर कुल दानराशि 31 करोड़ 17 लाख 92 हजार 129 रुपये रही। यह आंकड़ा मंदिर के प्रति श्रद्धालुओं की आस्था और देशभर में इसकी प्रसिद्धि को दर्शाता है।
श्री सांवलियाजी मंदिर की एक खास पहचान यह भी है कि कई व्यापारी और श्रद्धालु भगवान सांवलिया सेठ को अपना बिजनेस पार्टनर मानते हैं। वे अपने कारोबार से होने वाले मुनाफे का एक निश्चित हिस्सा मंदिर के भंडार में अर्पित करते हैं। इसी वजह से मंदिर में हर महीने करोड़ों रुपये का चढ़ावा आने की परंपरा चर्चा में रहती है।
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