RTI एक्टिविस्ट पर सुप्रीम कोर्ट की फटकार, अग्रिम जमानत याचिका खारिज

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को आरटीआई एक्टिविज्म की भूमिका पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि यह अब कई मामलों में “नया धंधा” बनता जा रहा है। अदालत ने सड़क निर्माण कार्य में बाधा डालने के आरोपी एक आरटीआई कार्यकर्ता और उनके सहयोगी को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया।
जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने आरटीआई एक्टिविस्ट राकेश कुमार बहल और उनके साथी की याचिका खारिज करते हुए सरकारी परियोजनाओं की निगरानी को लेकर उनके दावे पर सवाल उठाए।
सुनवाई के दौरान अदालत ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि सरकारी फंड से चल रही परियोजनाओं की निगरानी संबंधित विभागों का काम है, न कि किसी व्यक्ति विशेष का। जस्टिस मेहता ने टिप्पणी की, “आरटीआई एक्टिविज्म एक नया धंधा बन गया है। केंद्र सरकार फंड जारी करती है और वही काम की निगरानी करेगी। आप कोई अधिकारी नहीं हैं।”
उन्होंने आगे कहा कि तथाकथित एक्टिविस्ट को निर्माण कार्य में दखल देने का अधिकार नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिका स्वीकार करने का कोई आधार नहीं बनता।
जस्टिस विजय बिश्नोई ने भी इस रुख का समर्थन करते हुए सवाल उठाया कि सड़क निर्माण कार्य की निगरानी का अधिकार आखिर किसे दिया गया है। उन्होंने कहा, “क्या आप कोई उच्च अधिकारी हैं जो निगरानी करेंगे?”
याचिकाकर्ता राकेश कुमार बहल ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें अग्रिम जमानत देने से इनकार किया गया था। उनकी ओर से दलील दी गई कि उन्हें झूठे मामले में फंसाया गया है क्योंकि उन्होंने कथित भ्रष्टाचार का खुलासा किया था।
हालांकि हाईकोर्ट ने 14 मई के आदेश में कहा था कि एफआईआर में लगाए गए आरोप सरकारी कार्य में बाधा डालने और धमकी देने से जुड़े हैं, इसलिए उन्हें अग्रिम जमानत का लाभ नहीं दिया जा सकता।
एफआईआर के अनुसार, राकेश कुमार बहल और उनके सहयोगी पर आरोप है कि उन्होंने पंजाब के गुरदासपुर जिले के बटाला में चल रहे सड़क निर्माण कार्य को बाधित किया और मौके पर मौजूद इंजीनियर तथा मजदूरों को धमकाया। आरोप यह भी है कि उन्होंने श्रमिकों के साथ अभद्र व्यवहार किया और शिकायतकर्ता को चोट पहुंचाई।
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