चैरिटी की आड़ में फंडिंग का खेल? जांच एजेंसियों के सामने बढ़ी चुनौती

HIGHLIGHTS
- जांच में कुछ संगठनों के केवल दिखावे के लिए बनाए जाने का दावा सामने आया।
- अधिकारियों के अनुसार, छोटी-छोटी रकम बैंकिंग माध्यमों से भी भारत पहुंचाई जाती है।
- हवाला के जरिए रकम पहुंचाने के तरीके का भी जांच में जिक्र किया गया।
धर्मार्थ यानी चैरिटी, शिक्षा, धर्म और स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े संगठनों की संख्या बीते कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ी है। भारतीय एजेंसियों की जांच में सामने आया है कि इनमें से सभी संगठन उन गतिविधियों के लिए नहीं बने हैं, जिनका वे दावा करते हैं।
जांच एजेंसियों के अनुसार, कई संगठन केवल दिखावे के लिए बनाए जाते हैं। इनका इस्तेमाल गलत तरीके से हासिल किए गए धन को जमा करने के लिए किया जाता है। बाद में इस रकम का इस्तेमाल आतंकवाद को बढ़ावा देने या देश के अलग-अलग हिस्सों में परेशानी पैदा करने के लिए किए जाने का आरोप है।
अधिकारी ने क्या कहा?
एक अधिकारी के मुताबिक, देश के खिलाफ बड़े स्तर पर अभियान चलाया जा रहा है। इसी वजह से ऐसे दिखावटी संगठनों की संख्या अचानक बढ़ती नजर आ रही है। अधिकारी ने कहा कि पाकिस्तान जैसे देश इसमें सबसे आगे हैं।
उनके अनुसार, पाकिस्तान की नीति भारत को धीरे-धीरे कमजोर करने और अलग-अलग स्थानों पर परेशानी पैदा करने की रही है।
अधिकारी ने बताया कि इस काम को संभालने वाले पाकिस्तानी लोग अपने देश के संसाधनों का इस्तेमाल नहीं करते। वे विदेशों में सक्रिय अपने एजेंटों के संपर्क में रहते हैं। इन एजेंटों को भारत में मौजूद अपने सहयोगियों से संपर्क कर ऐसे दिखावटी संगठन बनाने के लिए कहा जाता है।
पैसे का पता लगाना क्यों मुश्किल?
खुफिया ब्यूरो के एक अधिकारी ने बताया कि ऐसे संगठन आसानी से संदेह के घेरे में नहीं आते, क्योंकि वे खुले तौर पर ऐसी गतिविधि नहीं करते, जिससे उन पर शक हो।
अधिकारी के अनुसार, बाद में उनकी गतिविधियों का पता लगाया जा सकता है, लेकिन असली चुनौती उनके पैसों के स्रोत और लेनदेन को ट्रैक करना होती है।
उन्होंने बताया कि पैसा भारत में बैंकिंग व्यवस्था जैसे वैध माध्यमों से भी लाया जाता है। आम तौर पर रकम छोटी-छोटी होती है, क्योंकि भेजने वालों को बैंक के सामने लेनदेन का कारण बताना पड़ता है।
भारत के बैंकों में पैसा पहुंचने के बाद उसे निकाल लिया जाता है और इसके बाद यह रकम ऐसे संगठनों तक पहुंचाई जाती है।
हवाला के जरिए कैसे पहुंचता है पैसा?
अधिकारी ने बताया कि भारत में पैसा पहुंचाने का एक दूसरा तरीका भी काफी इस्तेमाल होता है, जिसे हवाला कहा जाता है। ऐसे लोग हवाला को भारत में पैसा लाने और फिर उसे संबंधित संगठनों तक पहुंचाने का सुरक्षित तरीका मानते हैं।
एक अन्य अधिकारी के अनुसार, केरल में इस तरीके का काफी इस्तेमाल हुआ है। राज्य के बड़ी संख्या में लोग खाड़ी देशों में काम करते हैं। इनमें से ज्यादातर लोग अपने परिवारों को रकम भेजने के लिए बैंकिंग व्यवस्था की जगह हवाला का इस्तेमाल करते हैं। उन्हें यह तरीका सस्ता और सुरक्षित लगता है।
अधिकारी ने बताया कि खाड़ी देशों में काम करने वाले लोगों के माध्यम से पैसा भारत भेजा जाता है। एजेंट उन्हें अलग से रकम देते हैं और इसे घर भेजी जाने वाली रकम के साथ भारत भेजने के लिए कहते हैं। भारत में एजेंट उनके परिवारों से वह पैसा ले लेते हैं। इसके बाद यही रकम संबंधित संगठनों तक पहुंचाई जाती है।
जांच एजेंसियों के सामने क्या चुनौती?
एक अधिकारी ने कहा कि ऐसे लेनदेन का पता लगाना मुश्किल होता है, क्योंकि इनकी संख्या काफी अधिक होती है। संगठनों और उनकी गतिविधियों की पहचान करना बहुत मुश्किल नहीं है, लेकिन पैसे के आने और आगे जाने के रास्ते का पता लगाना बड़ी चुनौती है।
पिछले 10 वर्षों में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए), प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और खुफिया ब्यूरो ने ऐसे संगठनों के खिलाफ लगातार कार्रवाई की है। कई संगठनों पर कार्रवाई भी की गई है।
हालांकि, अधिकारियों के अनुसार समस्या यह है कि कुछ समय रुकने के बाद नए संगठन सामने आ जाते हैं।
इन जांचों के दौरान खास तौर पर ईडी के लिए पैसे के स्रोत और उसके आगे जाने के रास्ते का पता लगाना सबसे बड़ी चुनौती रहा है। अधिकारियों का कहना है कि ऐसे संगठन किसी एक राज्य या क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं। हर राज्य में इनकी संख्या भले ही कम हो, लेकिन इनका फैलाव पूरे देश में है। इसी वजह से इनके खिलाफ कार्रवाई करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
जाकिर नाइक के संगठन से कैसे हुए प्रेरित?
अधिकारियों के अनुसार, इन संगठनों और उनसे जुड़े लोगों ने कट्टरपंथी इस्लामी उपदेशक जाकिर नाइक द्वारा बनाए गए इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन (आईआरएफ) से प्रेरणा ली है।
आईआरएफ शुरुआती संगठनों में से एक था, जिसने शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर चैरिटी के लिए धन जुटाने के उद्देश्य से संगठन बनाया था। हालांकि, आरोप है कि आईआरएफ में आने वाली ज्यादातर रकम का इस्तेमाल कट्टरपंथी विचारधारा फैलाने के लिए किया गया।
एक अधिकारी ने कहा कि नए संगठन भले ही आईआरएफ के स्तर पर काम नहीं करते हों, लेकिन इनकी संख्या बहुत अधिक होना सबसे बड़ी चुनौती है।
कुछ संगठन लंबे समय तक सक्रिय रहते हैं, जबकि कुछ को अस्थायी तौर पर बनाया जाता है। ऐसे संगठन प्राकृतिक आपदा, दंगे या विरोध-प्रदर्शन के दौरान सामने आते हैं। ये थोड़े समय तक सक्रिय रहकर राहत के नाम पर देश के अंदर से पैसे जुटाते हैं।
अधिकारी के अनुसार, मामला खत्म होने के बाद ऐसे संगठन बंद हो जाते हैं। इसके बाद जुटाई गई रकम को आतंकवादी संगठनों या देश में परेशानी पैदा करने वाले अन्य लोगों तक पहुंचाया जाता है।
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