हिंदू धर्म केवल पूजा नहीं, जीवन जीने की पद्धति है: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को हिंदू धर्म की प्रकृति को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि हिंदू धर्म केवल पूजा-पाठ या धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक जीवन पद्धति है।
शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के हिंदू बने रहने के लिए मंदिर जाना या विशेष धार्मिक कर्मकांड करना अनिवार्य नहीं है। कोर्ट ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति अपने घर या किसी साधारण स्थान पर भी दीपक जलाकर अपनी आस्था व्यक्त करता है, तो वही उसके धार्मिक विश्वास का प्रमाण माना जा सकता है।
नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ कर रही सुनवाई
यह टिप्पणी मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने सुनवाई के दौरान की। यह पीठ धार्मिक स्वतंत्रता, महिलाओं के धार्मिक स्थलों में प्रवेश और विभिन्न समुदायों की परंपराओं से जुड़े मामलों पर विचार कर रही है। इनमें सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़ा मामला और दाऊदी बोहरा समुदाय से संबंधित मुद्दे भी शामिल हैं।
पीठ में न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना, एम.एम. सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी. वराले, आर. महादेवन और जॉयमाल्या बागची भी शामिल हैं।
सुनवाई के दौरान क्या हुआ?
सुनवाई के 15वें दिन एक हस्तक्षेपकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. जी मोहन गोपाल ने दलील दी कि धार्मिक समुदायों के भीतर सामाजिक न्याय से जुड़े सवाल लगातार उठ रहे हैं। उन्होंने ऐतिहासिक संदर्भों का हवाला देते हुए कहा कि समय-समय पर हिंदू धर्म की परिभाषा को लेकर अलग-अलग व्याख्याएं दी गई हैं।
इस पर न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने टिप्पणी करते हुए कहा कि इसी कारण हिंदू धर्म को जीवन जीने का तरीका माना जाता है। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति को हिंदू बने रहने के लिए अनिवार्य रूप से मंदिर जाना या किसी विशेष कर्मकांड का पालन करना जरूरी नहीं है।
“दीपक जलाना भी आस्था का प्रमाण”
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने भी सुनवाई के दौरान टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति अपनी झोपड़ी या घर में दीपक जलाता है, तो वही उसकी आस्था और धार्मिक पहचान को दर्शाने के लिए पर्याप्त है।
धार्मिक स्वतंत्रता पर व्यापक चर्चा
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। शीर्ष अदालत ने पहले भी टिप्पणी की थी कि यदि हर धार्मिक परंपरा को न्यायालय में चुनौती दी जाने लगे तो इससे अनगिनत याचिकाएं बढ़ सकती हैं और सभी धर्मों पर इसका प्रभाव पड़ेगा।
गौरतलब है कि वर्ष 2018 में सबरीमाला मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 4:1 के बहुमत से 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को असंवैधानिक करार देते हुए हटा दिया था। इस फैसले के बाद देशभर में धार्मिक स्वतंत्रता और परंपराओं को लेकर व्यापक बहस छिड़ गई थी।
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