परिसीमन के खिलाफ तमिलनाडु में सियासी एकजुटता की कोशिश, सीएम विजय की बैठक से DMK-AIADMK दूर

HIGHLIGHTS
- चेन्नई के कलैवानर अरंगम में सांसदों की बैठक आयोजित हुई।
- बैठक में लोकसभा और राज्यसभा के करीब 21 सांसद शामिल हुए।
- तमिलनाडु के कुल 57 सांसदों में से 36 बैठक से दूर रहे।
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने शनिवार को राज्य के सांसदों के साथ अहम बैठक की। बैठक का उद्देश्य केंद्र सरकार के प्रस्तावित परिसीमन को लेकर एक साझा रणनीति तैयार करना था। हालांकि, राज्य की प्रमुख क्षेत्रीय पार्टियां डीएमके और एआईएडीएमके इस बैठक में शामिल नहीं हुईं।
तमिलनाडु के राजनीतिक दलों की प्रमुख मांग है कि लोकसभा की कुल सीटों की संख्या मौजूदा 543 पर ही बरकरार रखी जाए और राज्यों के बीच सीटों का वर्तमान बंटवारा भी न बदला जाए। इसमें तमिलनाडु की 39 लोकसभा सीटें भी शामिल हैं।
तमिलनाडु में लोकसभा और राज्यसभा को मिलाकर कुल 57 सांसद हैं, जिनमें से 36 सांसद बैठक में शामिल नहीं हुए। डीएमके के 22 लोकसभा और आठ राज्यसभा सांसद हैं। डीएमके के साथ एआईएडीएमके, पीएमके और डीएमडीके ने भी बैठक का बहिष्कार किया।
चेन्नई के कलैवानर अरंगम में हुई बैठक में लोकसभा और राज्यसभा के करीब 21 सांसद पहुंचे। इनमें कांग्रेस, वीसीके, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, माकपा, एमडीएमके और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के सांसद शामिल रहे। बैठक में मौजूद नेताओं ने जनसंख्या के आधार पर लोकसभा क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण का विरोध किया और कहा कि इससे तमिलनाडु का राजनीतिक प्रभाव कम हो सकता है।
कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम ने क्या कहा?
मुख्यमंत्री विजय की अध्यक्षता में हुई सर्वदलीय बैठक के बाद कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम ने कहा कि संसद में तमिलनाडु का प्रतिनिधित्व किसी भी स्थिति में कम नहीं होना चाहिए। उन्होंने इसे दलगत राजनीति से ऊपर का मुद्दा बताते हुए कहा कि यह तमिलनाडु के अधिकारों और संसद में उसके प्रतिनिधित्व से जुड़ा मामला है।
चिदंबरम ने कहा कि परिसीमन चाहे जनसंख्या के आधार पर हो या सभी राज्यों में समान वृद्धि के आधार पर, किसी भी तरीके से तमिलनाडु की संसद में भूमिका कम नहीं होनी चाहिए। उन्होंने सभी दलों से दलगत राजनीति से ऊपर उठकर राज्य के अधिकारों के लिए एकजुट होने की अपील की।
उन्होंने कहा कि बैठक में परिसीमन के अलग-अलग तरीकों के संभावित प्रभावों पर चर्चा हुई और इस बात पर सहमति बनी कि लोकसभा की कुल संख्या 543 पर स्थिर रहनी चाहिए तथा तमिलनाडु के 39 सांसदों का प्रतिनिधित्व सुरक्षित रहना चाहिए।
कांग्रेस का परिसीमन को लेकर क्या रुख?
कार्ति चिदंबरम ने कहा कि संसद में तमिलनाडु का प्रतिनिधित्व कम नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि जनसंख्या या आनुपातिक वृद्धि के आधार पर किसी भी तरह का बदलाव स्वीकार नहीं किया जाएगा।
उन्होंने कहा कि लोकसभा की संख्या 543 पर स्थिर रहनी चाहिए और राज्यों के बीच सीटों का मौजूदा बंटवारा भी बरकरार रहना चाहिए। इसके तहत 543 सदस्यों वाली लोकसभा में तमिलनाडु के 39 सदस्य बने रहेंगे। चिदंबरम ने कहा कि बड़ी संख्या वाली लोकसभा प्रभावी नहीं होगी और इससे राज्य को फायदा नहीं होगा।
डीएमके और एआईएडीएमके से साथ आने की अपील
चिदंबरम ने कहा कि परिसीमन से जुड़े सभी पहलुओं पर बैठक में विस्तार से चर्चा की गई। उनके मुताबिक, यह मुद्दा तमिलनाडु के साथ-साथ भारत के लिए भी नुकसानदायक हो सकता है और इसे किसी भी कीमत पर रोका जाना चाहिए।
उन्होंने उम्मीद जताई कि सभी राजनीतिक दल स्थिति की गंभीरता को समझेंगे और डीएमके तथा एआईएडीएमके भी इस मुद्दे पर उनके साथ आएंगे।
कांग्रेस सांसद प्रवीण चक्रवर्ती ने भी दोनों दलों के बैठक में शामिल नहीं होने पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि लंबे समय तक राज्य में शासन करने वाली दोनों पार्टियों को तमिलनाडु के अधिकारों और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए मुख्यमंत्री द्वारा बुलाई गई बैठक में हिस्सा लेना चाहिए था।
उन्होंने कहा कि मांग स्पष्ट है—न तो लोकसभा की कुल सीटों की संख्या बदली जाए और न ही तमिलनाडु की सीटों में कोई बदलाव किया जाए।
डीएमके ने बैठक से दूरी क्यों बनाई?
सांसदों की सर्वदलीय बैठक से दूर रहने के अपने फैसले का डीएमके ने बचाव किया है। डीएमके प्रवक्ता टीकेएस इलंगोवन ने कहा कि पार्टी ने बैठक का बहिष्कार इसलिए किया क्योंकि तमिलगा वेत्री कझगम यानी टीवीके ने परिसीमन को लेकर अपना रुख स्पष्ट नहीं किया है।
उन्होंने कहा कि परिसीमन को लेकर टीवीके का रुख स्पष्ट नहीं है और बैठक का एजेंडा भी साफ नहीं किया गया था। इलंगोवन के मुताबिक, पिछली बार संसद में विधेयक आने पर डीएमके ने उसका विरोध किया था।
उन्होंने कहा कि टीवीके को यह बताना चाहिए था कि वह परिसीमन के मुद्दे पर क्या सोचती है और बैठक में किन विषयों पर चर्चा होने वाली है।
सीएम विजय की पहल का क्या असर होगा?
मुख्यमंत्री विजय ने तमिलनाडु के लोकसभा और राज्यसभा सांसदों को एक मंच पर लाकर केंद्र सरकार की प्रस्तावित परिसीमन प्रक्रिया पर चर्चा करने के लिए बैठक बुलाई थी।
दक्षिण भारत के कई राज्यों में इस बात को लेकर चिंता है कि जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण से संसद में उनका प्रतिनिधित्व कम हो सकता है।
डीएमके, एआईएडीएमके और पीएमके ने बैठक से दूरी बनाए रखी। डीएमके पहले भी परिसीमन को लेकर टीवीके के रुख और बैठक के स्पष्ट एजेंडे पर सवाल उठा चुकी है।
तमिलनाडु में परिसीमन का विरोध लंबे समय से चली आ रही चिंताओं से जुड़ा हुआ है। प्रस्तावित परिसीमन 2026 के बाद होने वाली जनगणना के आंकड़ों से संबंधित है।
दक्षिणी राज्यों को किस बात की चिंता?
तमिलनाडु और केरल जैसे दक्षिणी राज्यों ने पिछले कई दशकों में जनसंख्या नियंत्रण और परिवार नियोजन की नीतियों को सफलतापूर्वक लागू किया है। वहीं, कई उत्तरी राज्यों में जनसंख्या वृद्धि दर अधिक रही है।
दक्षिणी राज्यों को आशंका है कि अगर लोकसभा सीटों का बंटवारा सख्ती से जनसंख्या के आधार पर किया गया तो जनसंख्या नियंत्रण में उनकी सफलता उनके लिए नुकसान का कारण बन सकती है।
ऐसी स्थिति में अधिक जनसंख्या वाले राज्यों को लोकसभा सीटों में अपेक्षाकृत ज्यादा हिस्सा मिल सकता है, जबकि दक्षिणी राज्यों की संसद में राजनीतिक आवाज और संघीय प्रभाव कम हो सकता है।
इसी संघीय संतुलन को बनाए रखने के लिए तमिलनाडु के राजनीतिक दल लोकसभा की कुल सदस्य संख्या 543 पर स्थिर रखने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि इससे जनसंख्या को स्थिर रखने वाले राज्यों का प्रतिनिधित्व सुरक्षित रह सकेगा।
परिसीमन में जनसंख्या का आधार क्यों अहम?
पिछले पांच दशकों में दक्षिणी राज्यों ने परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण से जुड़े राष्ट्रीय निर्देशों को सफलतापूर्वक लागू किया है। इसके कारण कई उत्तरी राज्यों की तुलना में इन राज्यों की जनसंख्या हिस्सेदारी धीमी गति से बढ़ी।
राज्यों को आशंका है कि अगर सीटों का बंटवारा जनसंख्या के अनुपात के आधार पर किया गया तो दक्षिणी राज्यों को जनसांख्यिकीय नुकसान हो सकता है। इसका असर उनके संसदीय प्रतिनिधित्व और केंद्र में राजनीतिक प्रभाव पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
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