इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा आदेश, कक्षा 1 से 8 तक के सभी शिक्षकों के दस्तावेजों की होगी जांच

HIGHLIGHTS
- सभी शिक्षकों को एक सप्ताह के भीतर बीएसए के पास नियुक्ति पत्र और शैक्षणिक प्रमाणपत्र जमा करने होंगे।
- शिक्षकों को निकट संबंधियों के शिक्षा विभाग में पदस्थ होने या सेवानिवृत्त होने की जानकारी शपथ पत्र में देनी होगी।
- दस्तावेजों के आधार पर शिक्षकों की नियुक्ति तिथि, योग्यता और मेरिट की एक्सेल शीट तैयार होगी।
प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बेसिक शिक्षा विभाग के कक्षा एक से आठ तक के सभी शिक्षकों को अपने नियुक्ति पत्र और शैक्षणिक दस्तावेज जमा करने का निर्देश दिया है। न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकलपीठ ने कुसुमलता की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया।
अदालत ने यह निर्देश स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) की जांच से जुड़ी जानकारी सामने आने के बाद दिया। एसटीएफ के अपर पुलिस अधीक्षक कार्यालय से मिले निर्देशों के आधार पर बताया गया कि याची ने गोरखपुर के कोदीपुर स्थित कंपोजिट प्राथमिक विद्यालय बैरीपार में कार्यरत सहायक अध्यापिका कुसुमलता श्रीवास्तव के शैक्षणिक दस्तावेजों का इस्तेमाल कर नौकरी हासिल की थी।
याची 12 और 13 अक्टूबर को एसटीएफ के सामने पेश नहीं हुई और सत्यापन के लिए अपनी शैक्षणिक योग्यता से जुड़े दस्तावेज भी जमा नहीं किए। पिछली सुनवाई में उनके अधिवक्ता ने बताया था कि ऑपरेशन के कारण वह बेड रेस्ट पर हैं।
फर्जी दस्तावेजों से नौकरी पाने के मामलों पर कोर्ट की चिंता
हाई कोर्ट ने कहा कि एसटीएफ की जांच में सामने आया है कि प्रदेश में बड़ी संख्या में शिक्षकों ने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नौकरी हासिल की है। कई मामलों में एक ही शैक्षणिक दस्तावेज के आधार पर 10 या उससे अधिक लोग नौकरी करते पाए गए हैं।
अदालत ने समन्वय पीठ के 22 जनवरी 2026 के आदेश, गरिमा सिंह बनाम राज्य, का भी उल्लेख किया। उस आदेश में प्रमुख सचिव को फर्जी तरीके से हुई नियुक्तियों को रद्द करने, वेतन की वसूली सहित कार्रवाई करने और ऐसे मामलों में मिलीभगत करने वाले अधिकारियों के खिलाफ कड़ी विभागीय तथा दंडात्मक कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए थे। इसके लिए छह महीने की समयसीमा निर्धारित की गई थी।
शिक्षकों की गुणवत्ता पर भी उठाए सवाल
अदालत ने कहा कि छात्र संख्या में कमी के कारण बड़ी संख्या में प्राथमिक विद्यालय बंद हुए हैं। मुफ्त किताबें, मिड-डे मील और यूनिफॉर्म जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराने के बावजूद स्थिति में सुधार नहीं होने पर कोर्ट ने शिक्षकों की गुणवत्ता को इसकी एक प्रमुख वजह बताया।
कोर्ट के अनुसार, यह समस्या केवल हाल में हुई नियुक्तियों तक सीमित नहीं है, बल्कि पिछले दो दशकों से बनी हुई है। एक अच्छे शिक्षक के लिए केवल विषय का ज्ञान होना पर्याप्त नहीं है। उसमें पढ़ाने की क्षमता, नियमित उपस्थिति, बच्चों के प्रति धैर्य और निष्पक्षता भी होनी चाहिए।
अदालत ने टिप्पणी की कि जो व्यक्ति नियुक्ति करने वाले प्राधिकारी को धोखा देकर नौकरी हासिल करता है, उससे बच्चों के भरोसे पर खरा उतरने की उम्मीद नहीं की जा सकती।
एक सप्ताह में बीएसए को जमा करने होंगे दस्तावेज
हाई कोर्ट ने सभी शिक्षकों को एक सप्ताह के भीतर अपने दस्तावेज बेसिक शिक्षा अधिकारी (बीएसए) के पास जमा करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही उन्हें नोटरी से प्रमाणित शपथ पत्र देना होगा, जिसमें यह स्पष्ट करना होगा कि उनका कोई निकट संबंधी शिक्षा विभाग में बीएसए या उससे ऊपर के पद पर कार्यरत है या सेवानिवृत्त हो चुका है या नहीं।
निकट संबंधियों में पति या पत्नी, पिता, पुत्र, पुत्री, दामाद, बहू, सास, ससुर, साला, जीजा और चचेरे भाई-बहन आदि शामिल होंगे। यदि किसी शिक्षक का ऐसा कोई संबंधी नहीं है, तो उसे इस संबंध में भी शपथ पत्र देना होगा।
अदालत ने सभी बीएसए को तत्काल प्रधानाध्यापकों और प्रभारी प्रधानाध्यापकों के लिए आवश्यक आदेश जारी करने को कहा है।
दस्तावेजों की एक्सेल शीट बनाकर एसटीएफ को भेजी जाएगी
शिक्षकों से दस्तावेज मिलने के बाद उनके नाम, नियुक्ति की तारीख, शैक्षणिक योग्यता, नियुक्ति के समय निर्धारित न्यूनतम योग्यता और गजट के अनुसार प्राप्त मेरिट सहित अन्य विवरणों की एक्सेल शीट तैयार की जाएगी।
यह शीट संबंधित दस्तावेजों के साथ एसटीएफ की संबंधित रेंज को भेजी जाएगी। एसटीएफ के रेंज प्रमुख सत्यापन की व्यवस्था करेंगे। जरूरत पड़ने पर वे पुलिस अधीक्षक, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक या पुलिस आयुक्त की सहायता भी ले सकेंगे।
अधिकारियों की जिम्मेदारी भी तय
हाई कोर्ट ने बीएसए की कार्रवाई की निगरानी की जिम्मेदारी शिक्षा निदेशक को सौंपी है। वहीं, अपर पुलिस महानिदेशक, एसटीएफ सत्यापन और जांच की निगरानी करेंगे।
अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी अधिकारी की लापरवाही को गंभीरता से लिया जाएगा और संबंधित अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह ठहराया जा सकता है।
मामले को अनुपालन रिपोर्ट और आगे विचार के लिए चार नवंबर 2026 को सूचीबद्ध किया गया है। कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को यह भी कहा कि यदि उन्हें प्रशासनिक कठिनाइयों या संसाधनों की कमी का सामना करना पड़ता है, तो वे अगली सुनवाई से पहले इस बारे में अदालत को अवगत करा सकते हैं।
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