स्कूल में स्कार्फ या हिजाब पहनने की अनुमति नहीं, इलाहाबाद HC ने खारिज की छात्रा की याचिका

HIGHLIGHTS
- छात्रा ने कक्षा 11 में दाखिले के दौरान स्कार्फ पहनने की अनुमति मांगी थी
- स्कूल प्रबंधन ने इसे ड्रेस कोड का उल्लंघन बताया
- छात्रा ने अनुच्छेद 14 और 19(1)(ए) के तहत अधिकारों का हवाला दिया
प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि स्कूल में स्कार्फ या हिजाब पहनने की अनुमति नहीं है। अदालत ने कहा कि स्कूल यूनिफार्म अनुशासन, छात्रों के बीच समानता, संस्थागत पहचान और धर्मनिरपेक्ष माहौल को बढ़ावा देती है, क्योंकि यह सभी धर्मों के विद्यार्थियों पर समान रूप से लागू होती है।
प्रयागराज के अत्तरसुइया स्थित टैगोर पब्लिक स्कूल की नाबालिग छात्रा सुकैना रिजवी की याचिका खारिज करते हुए न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने यह टिप्पणी की। छात्रा ने स्कूल की निर्धारित यूनिफार्म के साथ अतिरिक्त रूप से स्कार्फ यानी हिजाब पहनकर कक्षा में बैठने की अनुमति मांगी थी।
छात्रा ने इसी स्कूल से हाईस्कूल की पढ़ाई पूरी की थी और कक्षा 11 में दाखिला लेना चाहती थी। उसका कहना था कि वह कक्षा छह से ही स्कार्फ पहनकर स्कूल आती रही है और इस पर कभी आपत्ति नहीं जताई गई। इसके समर्थन में उसने आईडी कार्ड के साथ कक्षा 8, 9 और 10 की ग्रुप फोटो भी अदालत में पेश की।
कक्षा 11 में दाखिले के समय स्कूल प्रबंधन ने कहा कि स्कार्फ पहनकर आना ड्रेस कोड का उल्लंघन है और इसी वजह से उसे प्रवेश नहीं दिया जा सकता। इसके बाद छात्रा ने जिलाधिकारी को 14 मई और 10 जून 2026 को दो शिकायत पत्र दिए।
जिलाधिकारी ने जिला विद्यालय निरीक्षक से रिपोर्ट मांगी। सहायक डीआइओएस ने दोनों पक्षों को सुना। प्रधानाचार्या ने कहा कि स्कूल सह-शिक्षा संस्था है, जहां सभी समुदायों के बच्चे पढ़ते हैं और सभी विद्यार्थियों के लिए समान ड्रेस कोड लागू है। किसी एक छात्रा को विशेष छूट देने से व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
छात्रा की ओर से वकील ने तर्क दिया कि स्कार्फ पहनना संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है। यह उसकी गरिमा और शारीरिक स्वायत्तता से भी जुड़ा है। वकील ने कहा कि स्कार्फ पहनना छात्रा के धार्मिक आचरण का हिस्सा है।
वकील के अनुसार, इसे रोकना अनुच्छेद 14 और 19(1)(ए) के तहत मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा। वहीं, राज्य सरकार और सीबीएसई की ओर से पेश वकील ने कहा कि स्कूल एक निजी गैर-सहायता प्राप्त संस्था है, जो राज्य के सीधे नियंत्रण के अधीन नहीं आती।
यूनिफार्म तय करना स्कूल प्रशासन की नीति का हिस्सा है और इसका उद्देश्य छात्रों में एकरूपता बनाए रखना है। हाई कोर्ट ने कहा कि पहले आपत्ति नहीं जताया जाना ढिलाई, लापरवाही, इच्छाशक्ति की कमी या शालीनता के कारण भी हो सकता है।
अदालत ने फातिमा थस्नीम बनाम केरल राज्य मामले में केरल हाई कोर्ट की टिप्पणी का भी उल्लेख किया। इसमें कहा गया था कि छात्रा का अपनी ड्रेस चुनने का अधिकार और संस्था का प्रबंधन करने का अधिकार दोनों मौलिक हैं, लेकिन जब दोनों के बीच टकराव हो तो संस्था के व्यापक हित को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
अदालत ने बॉम्बे हाई कोर्ट की उस टिप्पणी को भी दोहराया, जिसमें कहा गया था कि सिर ढंकना इस्लाम धर्म का अनिवार्य हिस्सा साबित नहीं होता।
कर्नाटक हाई कोर्ट की पूर्ण पीठ के चर्चित रेशम बनाम कर्नाटक राज्य (हिजाब मामला 2022) के फैसले का भी विस्तार से उल्लेख किया गया। इसमें कहा गया था कि हिजाब पहनना इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है और यूनिफॉर्म तय करने का अधिकार संस्था के पास है।
इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। वहां दो जजों की पीठ ने बंटा हुआ फैसला दिया था। इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट का कोई अंतिम और सर्वमान्य निर्णय अब तक नहीं आया है।
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