'घूसखोर पंडित': फिल्म के नाम पर सियासी संग्राम, अखिलेश का भाजपा पर हमला

फिल्म के नाम को लेकर उठे विवाद पर समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भाजपा को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि कुछ वर्गों का इस्तेमाल कर उसी समाज के खिलाफ माहौल बनाना बेहद खतरनाक प्रवृत्ति है। उन्होंने आरोप लगाया कि एक खास समुदाय को चिन्हित कर उसे अपमानित और आरोपित करने की साजिश रची जा रही है।
अखिलेश ने फिल्म का नाम लिए बिना कहा कि उसका शीर्षक न केवल आपत्तिजनक बल्कि गहरी चोट पहुंचाने वाला है। ऐसे नामों को दोहराने से ही उस वर्ग के प्रति नफरत फैलाने का मकसद और मजबूत होता है। उन्होंने साफ कहा कि इस तरह की फिल्में नाम बदलकर भी रिलीज नहीं होनी चाहिए। जब तक निर्माताओं को आर्थिक नुकसान नहीं होगा, तब तक ऐसी मानसिकता वाली फिल्मों पर रोक नहीं लगेगी।
सपा प्रमुख ने कहा कि यह मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नहीं, बल्कि जिम्मेदार रचनात्मक सोच का है। अगर कोई फिल्म पूर्वाग्रह से प्रेरित होकर किसी एक वर्ग की भावनाओं को ठेस पहुंचाने के लिए बनाई जाती है तो उसे मनोरंजन नहीं कहा जा सकता। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर उद्देश्य सिर्फ मनोरंजन नहीं है, तो फिर इसके पीछे काम कर रहे एजेंडे को भी सामने आना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि अभिव्यक्ति की आज़ादी वहीं तक स्वीकार्य है, जहां तक वह दूसरों की गरिमा और सम्मान को ठेस न पहुंचाए। सिनेमा को समाज का आईना कहा जाता है, लेकिन यह आईना गंदा या विकृत नहीं होना चाहिए।
फिल्म का शीर्षक समाज को बांटने वाला : दीपक मिश्र
समाजवादी चिंतक दीपक मिश्र ने केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव और केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के अध्यक्ष प्रसून जोशी को पत्र भेजकर विवादित फिल्म शीर्षक को निरस्त करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि ऐसी व्यवस्था बननी चाहिए जिससे भविष्य में इस तरह की आपत्तिजनक गलतियों की पुनरावृत्ति न हो।
दीपक मिश्र ने कहा कि किसी पूरी जाति को सार्वजनिक रूप से गलत छवि के साथ पेश करना घोर दुर्भावना का परिचायक है, जिससे समाज में नफरत और विभाजन फैल सकता है। भारतीय सिनेमा की परंपरा हमेशा सामाजिक सौहार्द और भाईचारे को बढ़ावा देने की रही है, ऐसे में किसी को भी निजी लाभ के लिए सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचाने की छूट नहीं दी जा सकती।
उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि किसी भी जाति या समुदाय के नाम का इस तरह इस्तेमाल किया जाता, चाहे वह यादव हो, मुसलमान, दलित, पाल, पासी, लोधी या धोबी — तब भी समाजवादी बौद्धिक मंच उतनी ही मजबूती से विरोध करता।
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