मनुस्मृति पर खरगे के बयान से राज्यसभा में हंगामा, नड्डा बोले- जो कहा उसे साबित करें

HIGHLIGHTS
- राज्यसभा में पेपर लीक बिल पर चर्चा के दौरान मल्लिकार्जुन खरगे के बयान पर सदन में हंगामा हुआ।
- खरगे ने पेपर लीक, शिक्षा व्यवस्था और आरएसएस पर सवाल उठाए, जबकि सरकार ने उनके मनुस्मृति संबंधी बयान पर कड़ी आपत्ति जताई।
- सभापति ने खरगे की विवादित टिप्पणी को कार्यवाही से हटाने का निर्देश दिया।
संसद के मानसून सत्र के दौरान गुरुवार को राज्यसभा में पब्लिक एग्जामिनेशन अमेंडमेंट बिल पर चर्चा हुई। बहस के दौरान विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि शैक्षणिक संस्थानों पर आरएसएस का कब्जा हो गया है। इसी दौरान मनुस्मृति को लेकर दिए गए उनके बयान पर सदन में जोरदार हंगामा शुरू हो गया। सरकार ने उनके बयान को समाज में अशांति फैलाने वाला बताया।
राज्यसभा में बोलते हुए कांग्रेस सांसद मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में 152 परीक्षाओं के पेपर लीक हुए, लेकिन किसी एक व्यक्ति को भी सजा नहीं मिली। उन्होंने सवाल उठाया कि सरकार क्या कर रही थी और संबंधित एजेंसियां उस समय क्या कर रही थीं। उन्होंने कहा कि शिक्षा किसी विशेष वर्ग का अधिकार नहीं है। उनके अनुसार, शैक्षणिक संस्थानों और विश्वविद्यालयों में आरएसएस से जुड़े लोगों की नियुक्तियां की जा रही हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि शिक्षा के लिए बजट में छह प्रतिशत हिस्सा होना चाहिए, जबकि वर्तमान में यह तीन प्रतिशत से भी कम है।
मनुस्मृति पर बयान के बाद बढ़ा विवाद
खरगे ने कहा कि विश्वविद्यालयों में अच्छे शिक्षक और कुलपति नियुक्त होने चाहिए, लेकिन पाठ्यक्रम में ऐसे विषय शामिल किए जा रहे हैं जिनमें शूद्रों से संबंधित दंडात्मक बातें लिखी गई हैं। उन्होंने कहा कि वे ऐसे विचारों की निंदा करते हैं और इस तरह की सामग्री को पाठ्यक्रम से हटाया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि यूपीए सरकार ने सभी को समान शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए शिक्षा का अधिकार कानून लागू किया था।
उनके इस बयान के बाद सदन में हंगामा शुरू हो गया। केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने खरगे के बयान की आलोचना करते हुए कहा कि विपक्ष के नेता ने जो बातें कहीं हैं, वे तथ्यों से परे हैं। उन्होंने कहा कि यदि उनके पास इसके समर्थन में कोई प्रमाण है तो उसे प्रस्तुत करें और मनुस्मृति के मूल पाठ का हवाला दें। इसके बाद नड्डा ने भाजपा सांसद सुधांशु त्रिवेदी को इस विषय पर अपनी बात रखने का अवसर देने की मांग की।
सुधांशु त्रिवेदी और प्रमोद तिवारी के बीच हुई तीखी बहस
सुधांशु त्रिवेदी ने अपनी बात रखते हुए पूर्व कलकत्ता हाईकोर्ट के न्यायाधीश विलियम जोन्स और डॉ. भीमराव आंबेडकर की पुस्तक का उल्लेख किया तथा मूल ग्रंथ के प्रमाणीकरण की आवश्यकता पर जोर दिया। इस दौरान कांग्रेस सांसद प्रमोद तिवारी ने एक पुस्तक दिखाते हुए कहा कि यह मौजूदा सरकार के कार्यकाल में प्रकाशित हुई है, बाजार में उपलब्ध है और इस पर कोई प्रतिबंध नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि सत्ता पक्ष इसी पुस्तक का हवाला देता है तो इसकी जिम्मेदारी भी उसी की बनती है, क्योंकि वह पिछले 12 वर्षों से सत्ता में है।
इसके जवाब में जेपी नड्डा ने फिर से मनुस्मृति के मूल और ब्रिटिश शासन से पहले के संस्करण को प्रस्तुत करने की मांग की। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के बयान समाज में अशांति फैलाने वाले हैं। बाद में सभापति ने मल्लिकार्जुन खरगे की मनुस्मृति संबंधी टिप्पणी को सदन की कार्यवाही से हटाने का निर्देश दिया।
लोक परीक्षा संशोधन विधेयक पर क्या बोले खरगे?
लोक परीक्षा संशोधन विधेयक पर बोलते हुए मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि पेपर लीक की घटनाओं से अनेक निर्दोष लोगों को नुकसान हुआ है। उन्होंने कहा कि कई लोगों की पिटाई हुई, माता-पिता परेशान हुए और महिलाओं व बच्चों को भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
उन्होंने कहा कि चर्चा के लिए लाए गए 'पब्लिक एग्जामिनेशन अमेंडमेंट बिल 2026' में केवल आंकड़े बदले गए हैं और इससे कोई विशेष बदलाव नहीं होगा। उनके अनुसार, अधिक जुर्माना, कड़ी सजा, स्पेशल टास्क फोर्स और फास्ट ट्रैक कोर्ट जैसे प्रावधान जोड़ने भर से समस्या का समाधान नहीं होगा। उन्होंने कहा कि वास्तविक फर्क इस बात से पड़ेगा कि परीक्षाओं का आयोजन किस तरह किया जाता है और उन्हें पेपर लीक से मुक्त कैसे रखा जाता है।
खरगे ने यह भी कहा कि उनकी पार्टी ने वर्ष 2024 में ही इस तरह का कड़ा कानून लाने की मांग की थी, लेकिन उस समय सरकार ने उनकी बात नहीं मानी। उन्होंने कहा कि सरकार ने अपने भाषण में यह कहा कि विपक्ष सहमत नहीं था, जबकि वे लगातार सख्त कानून बनाने की मांग करते रहे। उन्होंने सवाल उठाया कि जो काम सरकार दो साल बाद कर रही है, वह 2024 में ही क्यों नहीं किया गया।
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