पार्किंसंस रोग पर बड़ा शोध: पुरुष-महिला में भिन्नता और लक्षणों की नई जानकारी

ऑस्ट्रेलिया: पार्किंसंस रोग दुनिया में तेजी से फैलने वाला न्यूरोलॉजिकल विकार है। विश्व स्तर पर इसके एक करोड़ से अधिक मरीज हैं। ऑस्ट्रेलिया में वर्तमान में लगभग डेढ़ लाख लोग इस रोग से ग्रसित हैं और प्रतिदिन लगभग 50 नए मामले सामने आते हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2020 से 2050 के बीच पार्किंसंस रोग से प्रभावित लोगों की संख्या तीन गुना से अधिक बढ़ सकती है।
पार्किंसंस रोग क्या है?
पार्किंसंस रोग मस्तिष्क के “सब्स्टेंशिया निग्रा” नामक हिस्से में डोपामाइन नामक रासायनिक संदेशवाहक बनाने वाली कोशिकाओं के मरने से शुरू होता है। इसका असर मुख्य रूप से शरीर की गति और संतुलन पर पड़ता है। इसके आम लक्षण हैं – आराम की स्थिति में हाथ-पांव का कंपन, धीमी गति (ब्रैडीकाइनेसिया), मांसपेशियों में अकड़न और संतुलन संबंधी परेशानियाँ।
नए अध्ययन से क्या जानकारी मिली?
क्यूआईएमआर बर्गहोफर मेडिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट द्वारा संचालित ऑस्ट्रेलियाई पार्किंसंस जीनटिक्स अध्ययन में लगभग 11,000 लोगों के डेटा का विश्लेषण किया गया। 2022 में इसे राष्ट्रीय स्तर पर निरंतर अध्ययन के रूप में लांच किया गया। सर्वेक्षण में 10,929 प्रतिभागियों ने लार के नमूने दिए और आनुवंशिक परीक्षण करवाया। अध्ययन में पाया गया कि लक्षणों की शुरुआत की औसत आयु 64 वर्ष थी, जबकि निदान की औसत आयु 68 वर्ष थी।
अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष
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सामान्य लक्षणों में गंध की कमी (52%), स्मृति परिवर्तन (65%), दर्द (66%) और चक्कर आना (66%) शामिल हैं।
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96% प्रतिभागियों ने नींद संबंधी समस्याओं का अनुभव किया।
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यह रोग पुरुषों में महिलाओं की तुलना में 1.5 गुना अधिक पाया गया।
पुरुष और महिला रोगियों में अंतर
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महिलाओं में लक्षणों की शुरुआत की उम्र पुरुषों से थोड़ी कम थी (63.7 बनाम 64.4 वर्ष)।
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निदान की उम्र भी महिलाओं में कम थी (67.6 बनाम 68.1 वर्ष)।
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पुरुषों में स्मृति परिवर्तन और आवेगपूर्ण व्यवहार अधिक देखे गए, जबकि महिलाओं में दर्द और गिरने की घटनाएँ ज्यादा थीं।
जीन और पर्यावरण का योगदान
अध्ययन में पाया गया कि 25% लोगों का पारिवारिक इतिहास पार्किंसंस से जुड़ा था। केवल 10-15% मामलों का कारण किसी विशेष जीन में म्यूटेशन पाया गया। विशेषज्ञों का कहना है कि परिवार के जीन के अलावा साझा पर्यावरण भी रोग के विकास में भूमिका निभाता है।
इस अध्ययन से डॉक्टरों और शोधकर्ताओं को पार्किंसंस रोग के लक्षण, लिंग भेद और आनुवंशिक प्रभाव को बेहतर तरीके से समझने में मदद मिलेगी। इसके साथ ही यह भविष्य में रोगियों के लिए व्यक्तिगत उपचार और सावधानियों की दिशा में भी मार्गदर्शन प्रदान करेगा।
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