चीन समेत पड़ोसी देशों को एफडीआई नियमों में छूट, मोदी कैबिनेट का बड़ा फैसला

नई दिल्ली: छह साल बाद भारत ने चीन और अन्य सीमा-सटे देशों से आने वाले विदेशी निवेश के नियम में ढील देने का फैसला किया है। मंगलवार को कैबिनेट कमेटी की बैठक में यह निर्णय लिया गया कि अब भारतीय मैन्यूफैक्चरिंग कंपनियों में 10 प्रतिशत तक का निवेश करने के लिए इन देशों को सरकारी मंजूरी की आवश्यकता नहीं होगी, हालांकि निवेश की जानकारी इंडस्ट्रियल पॉलिसी और आंतरिक व्यापार विभाग (DPIIT) को देनी होगी।
गलवान झड़प के बाद कड़ा कदम
साल 2020 में गलवान घाटी में चीन के साथ सीमा विवाद और झड़प के बाद भारत ने सीमा-सटे देशों से होने वाले निवेश पर सरकारी मंजूरी अनिवार्य कर दी थी। इस कदम से कई इलेक्ट्रॉनिक्स और मोबाइल कंपनियों में चीन से निवेश प्रभावित हुआ था। टिकटॉक और कई अन्य चीनी एप पर भी प्रतिबंध लगाए गए थे।
निवेश में तेजी और समयबद्ध मंजूरी
नई नीति के तहत कैपिटल गुड्स, इलेक्ट्रॉनिक कैपिटल गुड्स, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स, पॉलिसिलिकॉन और इनगोट वेफर के उत्पादन में निवेश प्रस्तावों को 60 दिनों के भीतर मंजूरी देने की प्रक्रिया तय की गई है।
चीन पर निर्भरता कम करने का प्रयास
भारत इन सभी उत्पादों का भारी मात्रा में चीन से आयात करता है। मोबाइल फोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक्स का निर्यात जरूर किया जाता है, लेकिन इससे अधिक कच्चे माल और कंपोनेंट्स चीन से आयात होते हैं। नए निवेश नियम के लागू होने से इन उत्पादों का निर्माण भारत में ही शुरू करने में मदद मिलेगी। केवल उन्हीं कंपनियों को अनुमति दी जाएगी जिनका स्वामित्व भारतीय नागरिकों के पास होगा।
सरकार का मकसद
सरकार का कहना है कि इस फैसले से नई तकनीक में निवेश बढ़ेगा और कारोबार आसान होगा। इसके अलावा भारत वैश्विक सप्लाई चेन का हिस्सा बनने में सक्षम होगा। पिछले कुछ महीनों में चीन में भारत का निर्यात भी बढ़ा है। चालू वित्त वर्ष 2025-26 के पहले 10 महीनों में चीन को भारत का निर्यात पिछले साल के समान अवधि के मुकाबले 30 प्रतिशत से अधिक बढ़ा है। हालांकि, चीन से होने वाला आयात अभी भी निर्यात से कहीं अधिक है, जो 100 अरब डॉलर से ऊपर है।
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