मुर्शिदाबाद हिंसा मामला: सुप्रीम कोर्ट ने एनआईए को हाईकोर्ट में रिपोर्ट दाखिल करने का दिया निर्देश

पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में हुई हिंसा से जुड़े मामले की जांच को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए शीर्ष अदालत ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को निर्देश दिया है कि वह गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी यूएपीए के तहत की गई कार्रवाई की स्थिति रिपोर्ट कलकत्ता हाईकोर्ट में दाखिल करे।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि पश्चिम बंगाल सरकार को एनआईए जांच या यूएपीए के प्रावधानों को लागू किए जाने पर कोई आपत्ति है, तो वह अपनी बात हाईकोर्ट के समक्ष रख सकती है। अदालत ने कहा कि इस पूरे मामले में केंद्र सरकार के निर्णय की वैधता की जांच करने का अधिकार हाईकोर्ट के पास है।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ राज्य सरकार की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। पश्चिम बंगाल सरकार ने कलकत्ता हाईकोर्ट के उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें केंद्र को एनआईए से जांच कराने की अनुमति दी गई थी। इसके बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 28 जनवरी को औपचारिक रूप से जांच एनआईए को सौंप दी थी।
एनआईए को क्या निर्देश मिले
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की याचिका खारिज करते हुए एनआईए को निर्देश दिया कि वह जांच से जुड़ी स्टेटस रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में कलकत्ता हाईकोर्ट को सौंपे। रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया जाए कि अब तक सामने आए साक्ष्यों के आधार पर यूएपीए की धाराएं पहली नजर में लागू करने योग्य थीं या नहीं।
हालांकि, अदालत ने साफ किया कि वह मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं कर रही है। साथ ही निर्देश दिया गया कि पश्चिम बंगाल सरकार की आपत्तियों पर कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली खंडपीठ सुनवाई करेगी, जहां इस संबंध में याचिका पहले से लंबित है।
सुनवाई के दौरान कोर्ट की मौखिक टिप्पणी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह सवाल भी उठाया कि एनआईए ने एफआईआर दर्ज करते समय यूएपीए की धारा 15, जो आतंकवादी गतिविधियों से जुड़ी है, किस आधार पर लगाई। कोर्ट ने कहा कि बिना केस डायरी और दस्तावेज देखे यह निष्कर्ष निकालना मुश्किल है कि यूएपीए की धाराएं सही तरीके से लगाई गईं। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि हर हिंसक या भावनात्मक घटना को स्वतः राष्ट्रीय आर्थिक या आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा नहीं माना जा सकता।
पश्चिम बंगाल सरकार की दलील
राज्य सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने तर्क दिया कि एनआईए अधिनियम के तहत ऐसा कोई निर्धारित अपराध नहीं हुआ था, जिसके आधार पर जांच केंद्रीय एजेंसी को सौंपी जाए। उन्होंने कहा कि राज्य पुलिस पहले ही एफआईआर दर्ज कर चुकी थी और गिरफ्तारियां भी हो चुकी थीं। ऐसे में विस्फोटक सामग्री के अभाव में यूएपीए की धारा 15 लागू करना सवालों के घेरे में है।
केंद्र सरकार का पक्ष
वहीं केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने दलील दी कि यह घटना भारत-बांग्लादेश सीमा के पास हुई थी, जहां हिंसा के दौरान घातक हथियारों का इस्तेमाल हुआ। उनके मुताबिक, इससे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े गंभीर सवाल पैदा होते हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि राज्य पुलिस एनआईए को जांच से जुड़े जरूरी दस्तावेज उपलब्ध नहीं करा रही है।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यूएपीए लागू करने का फैसला उचित था या नहीं, इसका अंतिम निर्णय कलकत्ता हाईकोर्ट साक्ष्यों की समीक्षा के बाद करेगा।
क्या है पूरा मामला
दरअसल, 20 जनवरी को कलकत्ता हाईकोर्ट की एक खंडपीठ ने मुर्शिदाबाद के बेलडांगा इलाके में दो दिनों तक चले तनाव और हिंसा के मामले में केंद्र सरकार को एनआईए जांच का आदेश देने की अनुमति दी थी। यह हिंसा झारखंड में एक प्रवासी मजदूर की कथित हत्या के विरोध में हुए प्रदर्शन के बाद भड़की थी।
इसके अलावा, विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने हालात सामान्य होने तक केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की तैनाती के भी निर्देश दिए थे। इन्हीं आदेशों के बाद गृह मंत्रालय ने मामला एनआईए को सौंपा, जिसे राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। अब इस मामले की आगे की सुनवाई कलकत्ता हाईकोर्ट में होगी, जहां यह तय किया जाएगा कि यूएपीए की धाराएं लगाना कानूनन उचित था या नहीं।
Comments0
Leave a comment
Join the conversation — your email will not be published.



























Reader comments
No comments yet
Be the first to share your perspective on this story.