करूर भगदड़ पीड़ितों के परिजनों को सरकारी नौकरी का मामला, सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश पर लगाई रोक

HIGHLIGHTS
- सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के मुख्य सचिव को नोटिस जारी किया।
- मामला करूर में पिछले साल हुई भगदड़ से जुड़ा है।
- हादसे में 41 लोगों की मौत हुई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मद्रास हाई कोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के उस आदेश को रद्द कर दिया गया था, जिसके तहत पिछले साल करूर में हुई भगदड़ में जान गंवाने वाले लोगों के रिश्तेदारों को सरकारी नौकरी देने का फैसला किया गया था।
बेंच ने क्या कहा?
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने तमिलनाडु के मुख्य सचिव और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया। सुनवाई के दौरान बेंच ने जनहित याचिका दायर करने वाले याचिकाकर्ता से सवाल किया कि सरकार की नीति पर सवाल उठाने वाले वे कौन होते हैं।
बेंच ने कहा कि अगर किसी हादसे में परिवार का इकलौता कमाने वाला सदस्य मारा जाता है, तो क्या सरकार उसके बेटे या बेटी को नौकरी नहीं दे सकती?
मद्रास हाई कोर्ट ने क्या फैसला दिया था?
टीवीके सरकार को झटका देते हुए मद्रास हाई कोर्ट ने 27 जुलाई को विजय के उस आदेश को रद्द कर दिया था, जिसमें पिछले साल करूर में भगदड़ में मारे गए लोगों के रिश्तेदारों को सरकारी नौकरी देने की बात कही गई थी। हाई कोर्ट ने कहा था कि इससे इसी तरह की अन्य मांगें भी सामने आ सकती हैं।
हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच में जस्टिस सीवी कार्तिकेयन और आर. शक्तिवेल शामिल थे। बेंच ने कहा था कि सरकारी विभागों में दया के आधार पर नियुक्ति का इंतजार कर रहे कई लोगों की जरूरतों को नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा।
क्या था पूरा मामला?
पिछले साल 27 सितंबर को करूर में टीवीके की एक सार्वजनिक सभा के दौरान भगदड़ मच गई थी। इस हादसे में 41 लोगों की मौत हो गई थी। घटना के बाद राजनीतिक रैलियों में भीड़ प्रबंधन और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठे थे।
भगदड़ में जान गंवाने वाले सभी लोगों के परिवारों को मुख्यमंत्री विजय ने 20-20 लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी थी। यह राशि सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों में ट्रांसफर की गई थी। इसके अलावा मुख्यमंत्री ने परिवारों को दीर्घकालिक सहायता देने का भी आश्वासन दिया था।
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