नेहा बोरा को दिल्ली हाई कोर्ट से झटका, 10 हजार रुपये के बॉन्ड को चुनौती देने वाली याचिका खारिज

HIGHLIGHTS
- हाई कोर्ट ने फैसले की विस्तृत प्रति बाद में जारी करने की बात कही।
- नेहा बोरा को 19 अक्टूबर को एसईएम के सामने पेश होने का नोटिस दिया गया था।
- उन्हें 16 अक्टूबर को निवारक हिरासत में लिया गया था और अगले दिन रिहा कर दिया गया।
नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट ने नेहा बोरा की याचिका खारिज कर दी है। बोरा ने एसईएम अदालत की ओर से जारी उस नोटिस को चुनौती दी थी, जिसमें जांच के दौरान शांति बनाए रखने के लिए 10,000 रुपये का बॉन्ड भरने और एक जमानती पेश करने को कहा गया था। हालांकि, हाई कोर्ट ने मजिस्ट्रेट को कुछ निर्देश दिए हैं, जिनमें नेहा बोरा को मामले से जुड़ी सभी प्रासंगिक सामग्री उपलब्ध कराना शामिल है।
'इस स्तर पर रिट याचिका खारिज कर रहा हूं'
फैसला सुनाते हुए न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने कहा, "मैं इस स्तर पर इस रिट याचिका को खारिज कर रहा हूं।" न्यायाधीश ने यह भी स्पष्ट किया कि कार्यवाही के दौरान छात्र नेता को सभी संबंधित सामग्री उपलब्ध कराने के संबंध में एसईएम को कुछ निर्देश दिए गए हैं। फैसले का विस्तृत आदेश अभी आना बाकी है।
व्यक्तिगत बॉन्ड भरने को क्यों कहा गया?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 126 के तहत 17 अक्टूबर को जारी पुलिस नोटिस में नेहा बोरा को 19 अक्टूबर को एसईएम के सामने पेश होने के लिए कहा गया था। नोटिस में उनसे यह बताने को कहा गया था कि जांच की अवधि तक शांति बनाए रखने के लिए एक जमानती के साथ 10,000 रुपये का व्यक्तिगत बॉन्ड क्यों न भरवाया जाए।
किन परिस्थितियों में भरवाया जाता है पीस बॉन्ड?
बीएनएसएस की धारा 126 के तहत एसईएम को ऐसे बॉन्ड पर हस्ताक्षर कराने का अधिकार है, जब उसके पास विश्वसनीय जानकारी हो कि कोई व्यक्ति शांति भंग कर सकता है, सार्वजनिक शांति में बाधा डाल सकता है या ऐसा कोई गलत काम कर सकता है, जिससे व्यवधान पैदा होने की आशंका हो।
16 अक्टूबर को हिरासत में ली गई थीं नेहा बोरा
नेहा बोरा को 16 अक्टूबर को उस समय निवारक हिरासत में लिया गया था, जब वह दिल्ली के कनॉट प्लेस में 'कॉकरोच जनता पार्टी' के 'लहरा दो तिरंगा' मार्च में शामिल होने जा रही थीं। उन्हें अगले दिन यानी 17 अक्टूबर को रिहा कर दिया गया था।
लोगों को उकसाने के आरोपों को दी चुनौती
वकील अधिक चिम्नी द्वारा तैयार की गई याचिका में नेहा बोरा ने पुलिस नोटिस को अस्पष्ट और तथ्यात्मक रूप से गलत बताया था। उन्होंने दलील दी थी कि नोटिस में शांति भंग होने की आशंका को साबित करने के लिए कोई सामग्री या जानकारी नहीं दी गई है।
एसईएम के समक्ष चल रही कार्यवाही 16 अक्टूबर को मंडी हाउस में नारेबाजी, बीएनएसएस की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा लागू होने के बावजूद जंतर-मंतर के आसपास बार-बार विरोध प्रदर्शन करने और उसी दिन के प्रदर्शन में शामिल होने के लिए लोगों को उकसाने के आरोपों से जुड़ी है।
गुरुवार को हुई सुनवाई के दौरान नेहा बोरा के वरिष्ठ वकील ने दलील दी थी कि नागरिकों को राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए किसी अनुमति की जरूरत नहीं है। उन्होंने यह भी कहा था कि लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन की मांग करने में कुछ भी गलत नहीं है।
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