उत्तराखंड में मदरसा बोर्ड खत्म करने के फैसले पर उलमा का विरोध

उत्तराखंड सरकार द्वारा मदरसा बोर्ड को समाप्त करने के फैसले पर मुस्लिम धार्मिक संगठनों ने कड़ी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि यह निर्णय संविधान और कानून दोनों के खिलाफ है और इसे तुरंत वापस लिया जाना चाहिए।
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के कार्यकारिणी सदस्य और इस्लामिक सेंटर ऑफ इंडिया के चेयरमैन मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली ने सरकार के फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि संविधान अल्पसंख्यकों को अपने शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और संचालित करने का अधिकार देता है। इस अधिकार को नजरअंदाज करना संवैधानिक भावना के खिलाफ है।
उन्होंने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट के कई फैसले अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के पक्ष में हैं। इसके अलावा, इसी साल जनवरी में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गैर-मान्यता प्राप्त मदरसों को लेकर यह स्पष्ट किया था कि मुस्लिम समुदाय इन्हें चला सकता है। ऐसे में उत्तराखंड सरकार को अपने फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए।
ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव मौलाना यासूब अब्बास ने भी इस कदम की आलोचना की। उन्होंने कहा कि एक ओर केंद्र सरकार मुसलमानों को आधुनिक शिक्षा से जोड़ने की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर मदरसों को निशाना बनाया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि मदरसों ने देश को कई प्रशासनिक अधिकारी, डॉक्टर, इंजीनियर और जनप्रतिनिधि दिए हैं। स्वतंत्रता आंदोलन में भी मदरसों की अहम भूमिका रही है। ऐसे में मदरसों के खिलाफ कार्रवाई करना उचित नहीं है। उन्होंने उत्तराखंड सरकार से अपना फैसला वापस लेने की मांग की।
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