इलाहाबाद हाईकोर्ट जज ने सुप्रीम कोर्ट में लोकसभा जांच समिति को दी चुनौती

इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में लोकसभा अध्यक्ष द्वारा उनके खिलाफ गठित तीन सदस्यीय जांच समिति को असंवैधानिक बताते हुए चुनौती दी है। यह समिति उनके खिलाफ लगे भ्रष्टाचार आरोपों की जांच के लिए बनाई गई थी।
न्यायमूर्ति वर्मा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने बताया कि जज (जांच) अधिनियम, 1968 के अनुसार, यदि किसी जज के खिलाफ इम्पीचमेंट मोशन दोनों सदनों में एक ही दिन प्रस्तुत किए गए हों, तो जांच समिति का गठन दोनों सदनों की संयुक्त सहमति से होना चाहिए। रोहतगी ने कहा कि इस मामले में राज्यसभा ने मोशन खारिज कर दिया, फिर भी लोकसभा अध्यक्ष ने स्वतंत्र रूप से समिति का गठन कर दिया, जिसे उन्होंने ‘अवैध’ बताया।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस दौरान यह सवाल उठाया कि क्या एक सदन में मोशन खारिज होने पर दूसरे सदन में कार्रवाई की जा सकती है। मुकुल रोहतगी ने कहा कि कानून के अनुसार, प्रक्रिया केवल तभी शुरू हो सकती है जब दोनों सदनों में मोशन सही तरीके से प्रस्तुत और स्वीकृत हों; अन्यथा पूरी कार्रवाई असंवैधानिक मानी जाएगी।
न्यायमूर्ति वर्मा को नई दिल्ली में उनके सरकारी आवास से जले हुए नोट मिलने के मामले में दिल्ली हाईकोर्ट से इलाहाबाद हाईकोर्ट में स्थानांतरित किया गया था। इसके बाद, मुख्य न्यायाधीश ऑफ इंडिया संजीव खन्ना ने उनके खिलाफ इन-हाउस जांच समिति बनाई, जिसने उन्हें दोषी पाया। वर्मा ने इस्तीफा देने से इनकार किया, जिसके बाद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने बहु-पक्षीय मोशन स्वीकार कर तीन सदस्यीय समिति का गठन किया।
अब न्यायमूर्ति वर्मा सुप्रीम कोर्ट में यह मांग कर रहे हैं कि लोकसभा अध्यक्ष की कार्रवाई, मोशन की स्वीकृति और जांच समिति द्वारा जारी नोटिस को रद्द किया जाए, क्योंकि उनका कहना है कि यह पूरी प्रक्रिया जज (जांच) अधिनियम के खिलाफ और असंवैधानिक है।
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