कपिल सिब्बल ने केंद्र सरकार पर साधा निशाना, यूजीसी नियमों को लेकर जताई चिंता

नई दिल्ली। राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने यूजीसी के नए संसदीय नियमों को लेकर केंद्र सरकार पर कड़ा प्रहार किया है। उन्होंने कहा कि सरकार किसी से विचार-विमर्श किए बिना नीतियां बनाने की प्रवृत्ति अपना रही है, जो देश के भविष्य के लिए खतरनाक हो सकती है।
सिब्बल ने एक इंटरव्यू में कहा कि हालांकि यूजीसी के 2026 के नियमों पर मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है और इसलिए सीधे टिप्पणी करना उचित नहीं होगा, लेकिन व्यापक दृष्टिकोण से देखा जाए तो भारत तभी विकसित राष्ट्र बन सकता है जब सभी वर्गों को साथ लेकर नीतियां बनाई जाएं। उन्होंने चेतावनी दी कि समाज के किसी भी हिस्से की अनदेखी करना देश के हित में नहीं है और इससे विभाजन पैदा हो सकता है।
यूजीसी पर सिब्बल की राय
सिब्बल ने कहा कि 2014 के बाद से सरकार की नीतियां बिना पर्याप्त चर्चा के बन रही हैं। उनका कहना है कि सरकार अपने फैसलों में किसी से राय नहीं लेती और यही रवैया हर बड़े निर्णय में दिखाई देता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत जैसे विविधता वाले देश में सभी समुदायों की चिंताओं को ध्यान में रखना जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में यूजीसी के 2026 संसदीय नियमों पर अंतरिम रोक लगा दी है। कोर्ट ने कहा कि नियमों में अस्पष्टता है और इनके लागू होने से समाज पर व्यापक और गंभीर प्रभाव पड़ सकते हैं। अदालत ने केंद्र और यूजीसी को 19 मार्च तक जवाब देने का निर्देश दिया है। याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि नए नियम जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा को सीमित कर रहे हैं।
आरटीआई पर भी जताई चिंता
सिब्बल ने सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून को लेकर भी चिंता व्यक्त की। उनका कहना है कि आरटीआई लोकतंत्र का आधार है और इसके जरिए नागरिक सरकार के कामकाज की पारदर्शिता सुनिश्चित कर सकते हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि इस अधिकार को सीमित किया गया, तो समाज को बड़ा नुकसान हो सकता है।
यूजीसी के नए नियम क्या हैं?
13 जनवरी को जारी किए गए नए नियमों के तहत सभी उच्च शिक्षा संस्थानों को भेदभाव की शिकायतों की जांच और समानता बढ़ाने के लिए ‘संसदीय कमेटी’ बनाना अनिवार्य किया गया है। इन समितियों में ओबीसी, एससी, एसटी, दिव्यांग और महिला प्रतिनिधियों को शामिल करना होगा। ये नियम 2012 के पुराने दिशानिर्देशों की जगह लाए गए हैं, जो केवल सलाहात्मक थे।
छात्र विरोध और सरकार का आश्वासन
कई राज्यों में छात्र संगठनों ने नए नियमों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। इस बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने भरोसा दिया कि नियमों का दुरुपयोग नहीं होने दिया जाएगा और किसी के साथ भेदभाव नहीं होगा। अदालत ने भी माना है कि याचिकाओं में कानून से जुड़े संवेदनशील सवाल उठाए गए हैं।
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