नए रोजगार कानून वीबी-जी-राम-जी को कर्नाटक सरकार ने ठुकराया, हाईकोर्ट में देगी चुनौती

कर्नाटक के कानून एवं संसदीय कार्य मंत्री एच.के. पाटिल ने गुरुवार को बताया कि राज्य मंत्रिमंडल ने केंद्र सरकार द्वारा लागू किए गए वीबी-जी-राम जी अधिनियम को मान्यता न देने का फैसला किया है। यह कानून पूर्ववर्ती यूपीए सरकार के दौरान शुरू की गई महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) की जगह लाया गया है। मंत्रिमंडल ने इस फैसले के साथ ही अधिनियम के खिलाफ न्यायालय का रुख करने का भी निर्णय लिया है।
पाटिल के अनुसार, कैबिनेट ने मनरेगा को समाप्त कर ‘विकसित भारत – रोजगार और आजीविका गारंटी मिशन’ के तहत वीबी-जी-राम जी अधिनियम लागू किए जाने के विरोध में कानूनी लड़ाई के साथ-साथ ‘जनता की अदालत’ में भी जाने का फैसला किया है।
योजना निर्माण की प्रक्रिया पर असर
मंत्रिमंडल के फैसले की जानकारी देते हुए पाटिल ने कहा कि सर्वसम्मति से तय किया गया है कि इस नए कानून को स्वीकार नहीं किया जाएगा और इसे अदालत में चुनौती दी जाएगी। कैबिनेट प्रस्ताव में कहा गया है कि वीबी-जी-राम जी अधिनियम संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त काम और आजीविका के अधिकार का उल्लंघन करता है। इसके साथ ही यह कानून पंचायतों को मिले संवैधानिक अधिकारों को कमजोर करता है और 73वें व 74वें संविधान संशोधनों की भावना के विपरीत है। स्थानीय आवश्यकताओं के आधार पर नीचे से ऊपर की योजना बनाने की प्रक्रिया भी इससे प्रभावित होती है।
राज्यों से बिना परामर्श के फैसला
कैबिनेट ने आरोप लगाया कि यह कानून देश के संघीय ढांचे को नुकसान पहुंचाता है। राज्यों को न तो परामर्श प्रक्रिया में शामिल किया गया और न ही उनकी सहमति ली गई, जबकि उनसे कुल खर्च का 40 प्रतिशत वहन करने की अपेक्षा रखी गई है। यह पूरी व्यवस्था केंद्र सरकार द्वारा एकतरफा तय शर्तों पर आधारित है।
ग्रामीणों के आर्थिक अधिकारों पर प्रभाव
मंत्रिमंडल का कहना है कि यह अधिनियम ग्रामीण आबादी के सामाजिक और आर्थिक अधिकारों को कमजोर करता है। रोजगार केवल उन्हीं क्षेत्रों में उपलब्ध होगा जिन्हें केंद्र सरकार अधिसूचित करेगी और मजदूरी दर भी केंद्र द्वारा तय की जाएगी, जिससे राज्य सरकारों द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी की गारंटी नहीं रहती।
कैबिनेट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह कानून महात्मा गांधी की ‘ग्राम स्वराज’ की अवधारणा के अनुरूप नहीं है। पंचायतों को न तो स्थानीय जरूरतों के अनुसार कार्यों का चयन करने की स्वतंत्रता मिलेगी और न ही प्राथमिकताएं तय करने का अधिकार। उन्हें केवल केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित मानकों के दायरे में ही काम करना होगा।
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