केरलम: 33 हफ्ते के गर्भ में पल रहा बच्चा, जन्म के बाद CWC को सौंप सकेंगे माता-पिता

HIGHLIGHTS
- हाई कोर्ट द्वारा गठित मेडिकल बोर्ड ने गर्भावस्था समाप्त न करने की सलाह दी।
- मेडिकल बोर्ड के अनुसार, भ्रूण में पाई गई स्थिति जानलेवा नहीं है।
- जेनेटिक टेस्टिंग नहीं होने के कारण विकास में देरी का अनुमान नहीं लगाया जा सका।
केरल हाई कोर्ट ने एक ऐसे जोड़े को जन्म के बाद अपने बच्चे को चाइल्ड वेलफेयर कमिटी (CWC) को सौंपने की अनुमति दे दी है, जिसके होने वाले बच्चे में 'स्केलेटल डिस्प्लेसिया' पाया गया है। जस्टिस हरिशंकर वी. मेनन ने कहा कि जब जोड़ा जन्म के बाद बच्चे को अपने पास नहीं रखना चाहता, तो गर्भावस्था को चिकित्सकीय रूप से समाप्त करने की आवश्यकता नहीं है। ऐसी स्थिति में बच्चे को CWC को सौंपा जा सकता है।
यह जोड़ा 33 सप्ताह से अधिक की गर्भावस्था को चिकित्सकीय रूप से समाप्त करने की अनुमति लेने के लिए हाई कोर्ट पहुंचा था। हालांकि, अदालत की ओर से गठित मेडिकल बोर्ड ने गर्भावस्था समाप्त न करने की सलाह दी थी।
मेडिकल बोर्ड ने क्या कहा?
मेडिकल बोर्ड ने अदालत को बताया कि भ्रूण में 'स्केलेटल डिस्प्लेसिया' है, लेकिन यह स्थिति जानलेवा नहीं है। इसलिए गर्भावस्था को समाप्त करने की जरूरत नहीं है। बोर्ड ने यह भी कहा कि यदि जोड़ा बच्चे को अपने पास नहीं रखना चाहता, तो जन्म के बाद उसे चाइल्ड वेलफेयर कमिटी को सौंपा जा सकता है।
बोर्ड के अनुसार, जेनेटिक टेस्टिंग नहीं होने के कारण गर्भावस्था के इस चरण में विकास में देरी का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। मेडिकल बोर्ड की सलाह पर विचार करने के बाद जोड़े ने गर्भावस्था को समाप्त नहीं करने का फैसला किया। इसके बाद उन्होंने बच्चे को CWC को सौंपने की अनुमति मांगी।
क्या है स्केलेटल डिस्प्लेसिया?
मेडिकल जर्नल्स के अनुसार, 'स्केलेटल डिस्प्लेसिया' 400 से लेकर 750 से अधिक दुर्लभ आनुवंशिक स्थितियों का एक व्यापक समूह है। ये स्थितियां हड्डियों और कार्टिलेज के बनने, बढ़ने या विकसित होने की प्रक्रिया को प्रभावित करती हैं।
इस समूह में 'एकोंड्रोप्लेसिया' शामिल है, जो बौनेपन का सबसे आम और जानलेवा नहीं होने वाला प्रकार है। इसमें हाथ-पैर छोटे रह जाते हैं और माथा उभरा हुआ होता है।
इसके अलावा, स्केलेटल डिस्प्लेसिया में हड्डियों के कमजोर होने से जुड़ी बीमारी और 'हाइपोकोंड्रोप्लेसिया' भी शामिल हैं। हाइपोकोंड्रोप्लेसिया में हाथ-पैर छोटे रह जाते हैं, लेकिन इसके लक्षण इतने हल्के हो सकते हैं कि बचपन या किशोरावस्था तक इस स्थिति का पता नहीं चल पाता।
स्केलेटल डिस्प्लेसिया के कुछ प्रकार जानलेवा भी होते हैं। इनमें फेफड़ों का विकास अधूरा रह सकता है या बच्चे का जन्म मृत हो सकता है।
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