सांगली-अकोला नगर निगम में एनसीपी (एसपी) बनी सत्ता की चाबी, भाजपा बहुमत से चूकी

महाराष्ट्र के नगर निगम चुनावों में नया राजनीतिक परिदृश्य उभरकर सामने आया है। सांगली और अकोला नगर निगम में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, लेकिन दोनों में ही बहुमत हासिल नहीं कर सकी। ऐसे में एनसीपी (एसपी) ने निर्णायक भूमिका निभाते हुए सत्ता गठन में किंगमेकर का दर्जा हासिल कर लिया है।
सांगली-मिरज-कुपवाड़ नगर निगम का हाल
78 सदस्यीय सांगली-मिरज-कुपवाड़ नगर निगम में भाजपा को 39 सीटें मिलीं, जबकि बहुमत के लिए 40 की जरूरत थी। कांग्रेस ने 18, अजित पवार गुट की एनसीपी ने 16, एकनाथ शिंदे गुट की शिवसेना ने दो और एनसीपी (एसपी) ने तीन सीटें हासिल की हैं। भाजपा बहुमत से केवल एक सीट दूर रह गई, जिससे छोटे दलों और निर्दलीयों के समर्थन की कवायद तेज हो गई है।
अकोला नगर निगम का सियासी समीकरण
80 सदस्यीय अकोला नगर निगम में बहुमत के लिए 41 सीटें चाहिए थी। भाजपा 38 सीटों के साथ बहुमत से तीन कम रह गई। कांग्रेस ने 21, शिवसेना (उद्धव गुट) ने छह, एनसीपी (एसपी) ने तीन सीटें जीतीं। इसके अलावा एनसीपी (शिंदे) और शिवसेना (शिंदे) को एक-एक सीट मिली, जबकि एआईएमआईएम, वीबीए और निर्दलीयों के खाते में दस सीटें आईं। अकोला में भी एनसीपी (एसपी) की भूमिका निर्णायक बन गई है।
सत्ता गठन के लिए तेज राजनीतिक बातचीत
दोनों नगर निगमों में सत्ता गठन को लेकर राजनीतिक हलचल बढ़ गई है। भाजपा को बहुमत के लिए छोटे दलों या निर्दलीयों का समर्थन चाहिए। वहीं खबरें हैं कि एनसीपी (एसपी) के पार्षद भाजपा से संपर्क में हैं। हालांकि सांगली में एनसीपी (एसपी) के पार्षद अभिजीत कोली ने कहा कि उनकी पार्टी महाविकास आघाड़ी का घटक है और सत्ता में हों या विपक्ष में, जनहित और विकास के लिए काम करेगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि अगला कदम पार्टी नेतृत्व तय करेगा।
स्थानीय जरूरतों के आधार पर गठबंधन की संभावना
अकोला में एनसीपी (एसपी) के प्रदेश अध्यक्ष शशिकांत शिंदे ने कहा कि स्थानीय स्तर पर सभी दलों के बीच बातचीत चल रही है, ताकि विकास और जनकल्याण पर काम करने वाला स्थानीय गठबंधन बनाया जा सके। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कोई भी गठबंधन पार्टियों और उनके चुनाव चिह्नों के आधार पर नहीं, बल्कि स्थानीय जरूरतों को ध्यान में रखकर होना चाहिए।
सांगली और अकोला में सत्ता की चाबी फिलहाल एनसीपी (एसपी) के हाथ में है, और भाजपा के सामने चुनौती यह है कि वह बहुमत जुटाए या विपक्ष में बैठने की रणनीति बनाए।
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