H-1B और L-1 वीजा रिन्यूअल होगा महंगा? ट्रंप प्रशासन का नया प्रस्ताव, भारतीयों पर पड़ सकता है सबसे ज्यादा असर

HIGHLIGHTS
- ट्रंप प्रशासन H-1B और L-1 वीजा एक्सटेंशन पर अतिरिक्त फीस लागू करने की तैयारी कर रहा है।
- प्रस्तावित बदलाव से गूगल, मेटा और अन्य बड़ी टेक कंपनियों का इमिग्रेशन खर्च बढ़ सकता है।
- वित्त वर्ष 2025 में मंजूर H-1B रिन्यूअल में भारतीय नागरिकों की हिस्सेदारी 77.6 प्रतिशत रही।
वॉशिंगटन। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन H-1B और L-1 वीजा की अवधि बढ़ाने की प्रक्रिया को और महंगा करने की तैयारी कर रहा है। इस फैसले से उन बड़ी अमेरिकी कंपनियों का खर्च बढ़ सकता है, जो विदेशी कुशल कर्मचारियों पर निर्भर हैं। इनमें हजारों भारतीय पेशेवर भी शामिल हैं।
होमलैंड सिक्योरिटी विभाग के रेगुलेटरी एजेंडा के मुताबिक, जल्द ही एक अंतिम नियम जारी होने की उम्मीद है। इसके तहत वर्क वीजा एक्सटेंशन की याचिकाओं पर भी 9-11 रिस्पॉन्स और बायोमेट्रिक एंट्री-एक्जिट फीस लागू की जा सकती है।
मौजूदा नियमों में क्या है प्रावधान?
अमेरिका के मौजूदा नियमों के अनुसार, जिन कंपनियों में 50 से ज्यादा कर्मचारी हैं और उनमें आधे से अधिक कर्मचारी H-1B या L-1 वीजा पर काम कर रहे हैं, उन्हें शुरुआती याचिका दाखिल करने या कर्मचारी के नियोक्ता बदलने के समय अतिरिक्त शुल्क देना पड़ता है।
इन कंपनियों को H-1B याचिका के लिए 4,000 डॉलर और L-1 याचिका के लिए 4,500 डॉलर की अतिरिक्त फीस का भुगतान करना होता है।
नियम में कहा गया है कि, "डीएचएस नियमों में बदलाव और स्पष्टीकरण कर रहा है ताकि यह स्पष्ट किया जा सके कि 9-11 रिस्पॉन्स फीस सभी H-1B और L-1 एक्सटेंशन याचिकाओं पर लागू होगी।"
गूगल और मेटा जैसी कंपनियों पर पड़ेगा असर
यह नया प्रस्ताव ट्रंप प्रशासन को हाल ही में मिली कानूनी हार के बाद सामने आया है। अमेरिकी फेडरल अपील्स कोर्ट ने नए H-1B वीजा पर प्रस्तावित 1,00,000 डॉलर फीस को रद्द करने वाले निचली अदालत के फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था।
आमतौर पर H-1B वीजा पर काम करने वाले कर्मचारियों को शुरुआती तीन साल के प्रवास के बाद वीजा बढ़वाने की जरूरत पड़ती है। ऐसे में प्रस्तावित बदलावों से उन कंपनियों का इमिग्रेशन खर्च बढ़ सकता है, जो विदेशी प्रतिभाओं पर काफी निर्भर हैं।
इस बदलाव का असर गूगल और मेटा जैसी मल्टीनेशनल कंपनियों पर भी पड़ सकता है। ये कंपनियां अपने अमेरिकी ऑपरेशंस में एग्जीक्यूटिव, मैनेजर और विशेष जानकारी रखने वाले कर्मचारियों को भेजने के लिए L-1 वीजा का इस्तेमाल करती हैं।
भारतीय कर्मचारियों पर भी असर की संभावना
इस प्रस्तावित बदलाव का असर अमेरिका में काम कर रहे भारतीय प्रोफेशनल्स पर भी पड़ सकता है, क्योंकि हर साल बड़ी संख्या में H-1B एक्सटेंशन भारतीय कर्मचारियों को मिलते हैं।
यूएस सिटिजनशिप एंड इमिग्रेशन सर्विसेज (USCIS) के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025 में कुल 406,685 H-1B याचिकाओं को मंजूरी दी गई। इनमें से 71 प्रतिशत मंजूरियां यानी 291,542 आवेदन पहले से जारी रोजगार को आगे बढ़ाने के लिए थीं, न कि नए आवेदकों के लिए।
इन मंजूरियों में से 226,359 भारतीय नागरिकों को मिलीं, जो सभी H-1B रिन्यूअल का 77.6 प्रतिशत है। इसके बाद चीन का स्थान रहा, जिसे 31,581 मंजूरियां मिलीं।
बड़ी टेक कंपनियों पर बढ़ सकता है बोझ
प्रस्तावित फीस बढ़ोतरी का असर खासतौर पर बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों और आईटी सर्विस कंपनियों पर पड़ सकता है, जो H-1B कर्मचारियों पर काफी निर्भर हैं।
नेशनल फाउंडेशन फॉर अमेरिकन पॉलिसी के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025 में नौकरी जारी रखने के लिए मंजूर हुई H-1B याचिकाओं में सबसे ज्यादा संख्या अमेजन की रही। अमेजन के लिए 14,532 याचिकाएं मंजूर हुईं।
इसके बाद टीसीएस की 5,293, माइक्रोसॉफ्ट की 4,863, मेटा की 4,740, एप्पल की 4,610 और गूगल की 4,509 याचिकाओं को मंजूरी मिली।
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