सीजेआई सूर्यकांत ने पीआईएल की बढ़ती संख्या पर जताई चिंता

नई दिल्ली। भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल (जनहित याचिकाओं) की बढ़ती संख्या पर चिंता जताई है। मंगलवार को सुनवाई के दौरान उन्होंने कहा कि अब कई लोग सिर्फ याचिका दाखिल करने के उद्देश्य से कोर्ट का रुख कर रहे हैं। सीजेआई ने बताया कि ऐसा लगता है कि लोग सुबह अखबार पढ़ते हैं और शाम तक नई याचिका दायर कर देते हैं। लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने यह भी कहा कि पीआईएल के मामलों की संख्या तेजी से बढ़ रही है और कुछ लोगों ने इसे अपने एजेंडे के लिए एक माध्यम बना लिया है।
प्रचार या निजी लाभ के लिए हो रही याचिकाएं
सीजेआई सूर्यकांत ने याद दिलाया कि 2022 में भी सुप्रीम कोर्ट ने इसी तरह की टिप्पणियां की थीं। तब अदालत ने कहा था कि कई याचिकाओं का जनता की भलाई से कोई संबंध नहीं होता, बल्कि यह व्यक्तिगत प्रचार या निजी लाभ के लिए दायर की जाती हैं। अदालत ने चेतावनी दी थी कि ऐसे मामलों से महत्वपूर्ण सुनवाई का समय बर्बाद होता है और उन्हें प्रारंभ में ही खारिज कर देना चाहिए, ताकि गंभीर और बड़े जनहित के मामलों पर ध्यान दिया जा सके।
एआई की मदद से तैयार याचिकाओं ने बढ़ाई जजों की मुश्किलें
सीजेआई ने वकीलों द्वारा याचिकाओं के मसौदे तैयार करने के तरीकों पर भी सवाल उठाए। विशेषकर उन्होंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का उपयोग करके तैयार की गई याचिकाओं पर नाराजगी जताई। मंगलवार को सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने इस मुद्दे पर चर्चा की।
जजों ने बताया कि एआई के जरिए बनाई गई याचिकाओं में कई बार ऐसे फैसलों का हवाला दिया जाता है, जो वास्तविक रूप में कभी नहीं हुए। उदाहरण के तौर पर, हाल ही में एक याचिका में 'मर्सी बनाम मैनकाइंड' नामक काल्पनिक फैसले का जिक्र किया गया, जबकि ऐसा कोई केस अस्तित्व में नहीं है।
फर्जी फैसलों के हवाले से बढ़ा बोझ
यह टिप्पणी शिक्षाविद रूप रेखा वर्मा की याचिका पर सुनवाई के दौरान आई, जिसमें नेताओं के भाषणों पर नियम बनाने की मांग की गई थी। जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि कई बार याचिकाओं में वास्तविक फैसलों के साथ फर्जी जानकारी जोड़ी जाती है, जिससे जजों के लिए सही तथ्यों का पता लगाना कठिन हो जाता है। उन्होंने बताया कि जस्टिस दीपांकर दत्ता की अदालत में भी कई बार ऐसे फर्जी फैसलों का हवाला दिया गया।
जजों का कहना है कि इस तरह की लापरवाही से न्यायाधीशों का काम का बोझ बढ़ जाता है, क्योंकि उन्हें हर जानकारी की गहन जांच करनी पड़ती है।
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