संजय गांधी को नियंत्रण में रखा जाता तो आपातकाल का नुकसान कम होता: सोनिया गांधी

HIGHLIGHTS
- सोनिया गांधी ने आपातकाल लागू करने के फैसले को गलती करार दिया।
- उनका मानना है कि इंदिरा गांधी भी बाद में इस फैसले को लेकर सहज नहीं थीं।
- सोनिया के मुताबिक, राजीव गांधी आपातकाल के फैसले के खिलाफ थे, जबकि संजय गांधी ने इसका समर्थन किया था।
नई दिल्ली। कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने आपातकाल लागू किए जाने के फैसले को गलत बताया है। उनका कहना है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री और उनकी सास इंदिरा गांधी को भी बाद में इस फैसले का अहसास हुआ होगा कि यह एक गलती थी। सोनिया गांधी ने अपनी आने वाली पुस्तक 'बिलांगिंग : अ जर्नी आफ लव' में आपातकाल के दौर और उससे जुड़े कई अहम पहलुओं का जिक्र किया है।
अपनी पुस्तक में सोनिया गांधी ने यह भी लिखा है कि अगर संजय गांधी को नियंत्रण में रखा गया होता तो आपातकाल के बाद पैदा हुए हालात और उससे हुए नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता था।
10 नवंबर को प्रकाशित होने वाले अपने संस्मरण से पहले ब्रिटिश अखबार 'द गार्जियन' को दिए इंटरव्यू में सोनिया गांधी ने कहा कि उन्हें हमेशा लगता रहा है कि इंदिरा गांधी मूल रूप से लोकतांत्रिक सोच रखती थीं। उन्होंने कहा, "मुझे पता है कि कई लोग इस बात पर हंसेंगे, लेकिन मेरा मानना है कि वह आपातकाल के दौरान अपनाए गए रास्ते को लेकर कभी सहज नहीं थीं।"
सोनिया गांधी के अनुसार, आपातकाल लागू करने के मुद्दे पर परिवार के भीतर भी एकमत नहीं था। राजीव गांधी इस फैसले के पक्ष में नहीं थे, जबकि संजय गांधी ने इसका समर्थन किया था। संजय गांधी का मानना था कि विपक्ष उनकी मां को राजनीतिक रूप से खत्म कर देगा और उसे रोकने के लिए सख्त कदम उठाना जरूरी था।
अयोध्या में विवादित ढांचा गिरते देख रो पड़ी थीं सोनिया गांधी
सोनिया गांधी ने वर्ष 1992 में अयोध्या के विवादित ढांचे को गिराए जाने की घटना को भी याद किया। उन्होंने बताया कि उस घटना को देखकर वह रो पड़ी थीं। उसी समय उन्हें एहसास हुआ कि जिस धर्मनिरपेक्ष भारत के निर्माण के लिए महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और उनके साथियों ने संघर्ष किया था, उसे बचाने के लिए अब लंबी लड़ाई लड़नी पड़ेगी।
उन्होंने यह स्वीकार भी किया कि भाजपा और उसकी हिंदूवादी राजनीति के बढ़ते प्रभाव के पीछे कुछ हद तक कांग्रेस की अपनी नाकामियां भी जिम्मेदार रही हैं।
इंदिरा गांधी ने भी सार्वजनिक रूप से जताया था खेद
सोनिया गांधी ने शनिवार को 'द हिंदू' में प्रकाशित एक अन्य इंटरव्यू में भी आपातकाल के दौरान हुए घटनाक्रम पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि इंदिरा गांधी ने बाद में सार्वजनिक रूप से उस दौर में हुई ज्यादतियों पर अफसोस जताया था और इसके लिए माफी भी मांगी थी।
जब उनसे पूछा गया कि आपातकाल का नाम लेते ही संजय गांधी का जिक्र क्यों होने लगता है, तो सोनिया गांधी ने कहा कि इस पूरे घटनाक्रम के लिए केवल संजय गांधी जिम्मेदार नहीं थे। उनके मुताबिक, इंदिरा गांधी पर उनके कुछ वरिष्ठ सहयोगियों का भी काफी दबाव था।
राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बनाने की बात सुनकर लगा था दिल पर गहरा आघात
'द गार्जियन' में प्रकाशित उनकी पुस्तक के एक अंश में सोनिया गांधी ने उस घटना का भी उल्लेख किया है, जब राजीव गांधी ने उन्हें बताया था कि इंदिरा गांधी की हत्या वाले दिन ही उनसे प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के लिए कहा गया था।
इस घटना को याद करते हुए सोनिया गांधी ने लिखा कि यह सुनकर उन्हें ऐसा महसूस हुआ, जैसे किसी ने उनके दिल में नश्तर चुभो दिया हो।
सोनिया गांधी ने बताया कि उन्होंने राजीव गांधी से प्रधानमंत्री नहीं बनने का आग्रह किया था। उन्होंने अपनी जान को खतरा होने की आशंका भी जताई थी। इस पर राजीव गांधी ने जवाब दिया था, "वे वैसे भी मुझे मार डालेंगे।"
सरकार की आलोचना को लेकर पुस्तक प्रकाशक पेंगुइन था असहज
सोनिया गांधी ने अपनी पुस्तक के प्रकाशन से जुड़े विवाद का भी जिक्र किया है। उनके मुताबिक, पुस्तक के प्रकाशक 'पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया' को सरकार की आलोचना से जुड़े अंशों को लेकर असहजता थी।
उन्होंने कहा कि पेंगुइन की ओर से पुस्तक प्रकाशित नहीं करने के फैसले से उन्हें निराशा हुई, हालांकि उन्हें इस निर्णय पर आश्चर्य नहीं हुआ। 'द गार्जियन' के अनुसार, सोनिया गांधी ने इस घटनाक्रम को अपनी पुस्तक को सेंसर करने की कोशिश के तौर पर देखा। बाद में इस पुस्तक को हार्पर कॉलिन्स इंडिया ने प्रकाशित किया।
राजनीति में आने की दुविधा भगवद्गीता से हुई दूर
अपने संस्मरण में सोनिया गांधी ने राजीव गांधी की हत्या के बाद राजनीति में आने को लेकर अपने मन में चल रहे असमंजस का भी खुलासा किया है। उन्होंने लिखा कि उस समय वह खुद तय नहीं कर पा रही थीं कि उन्हें राजनीति में कदम रखना चाहिए या इससे दूर रहना चाहिए।
उनके बच्चे राहुल गांधी और प्रियंका गांधी भी उनके राजनीति में आने के पक्ष में नहीं थे। सोनिया गांधी ने लिखा कि उनका अपना एक हिस्सा भी राजनीति की दुनिया से दूर रहना चाहता था। ऐसे मुश्किल समय में भगवद्गीता ने उनकी दुविधा दूर करने और आगे का रास्ता चुनने में मदद की।
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