यदि आप योगी हैं, तो सीएम पद पर क्यों? अविमुक्तेश्वरानंद का सरकार पर हमला

वाराणसी। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने प्रदेश सरकार और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर तीखी टिप्पणी करते हुए कई सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि यदि कोई स्वयं को योगी बताता है, तो उसे सत्ता के पद पर बने रहने के औचित्य पर भी विचार करना चाहिए। उनका कहना था कि शंकराचार्य पद की मान्यता के लिए किसी सरकारी प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती।
स्वामी ने स्मरण दिलाया कि पिछले माघ मेले के दौरान प्रदेश सरकार की ओर से 24 घंटे के भीतर उनसे शंकराचार्य होने का प्रमाण मांगा गया था। उन्होंने दावा किया कि उन्होंने निर्धारित समय में सभी आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत कर दिए थे। इसके बाद उन्होंने सरकार को 40 दिन का समय देते हुए चुनौती दी थी कि वह अपने ‘असली हिंदू’ होने का प्रमाण दे। उनके अनुसार 9 फरवरी तक इस अवधि के 10 दिन बीत चुके हैं, लेकिन कोई उत्तर सामने नहीं आया।
उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार और मुख्यमंत्री ने अब तक अपने आचरण से ही संदेह उत्पन्न किया है। स्वामी ने कहा कि हाल में मुख्यमंत्री ने पशुपालन मंत्री को एक लेख पढ़ने के लिए दिया, जिसमें यह उल्लेख था कि प्रदेश में गाय नहीं, बल्कि भैंस, बकरा और सूअर का वध होता है। स्वामी के अनुसार यह स्वीकारोक्ति कई लोगों के लिए असहज करने वाली है।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने दोहराया कि शंकराचार्य पद की गरिमा किसी शासन की स्वीकृति पर निर्भर नहीं है। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति स्वयं को हिंदू कहे और शंकराचार्य की परंपरा को न माने, वह अपने दावे पर स्वयं प्रश्नचिह्न लगा देता है। उन्होंने आदि शंकराचार्य के मठाम्नाय महानुशासन का उल्लेख करते हुए कहा कि धर्म मनुष्य का मूल है और वह आचार्य पर आधारित है।
केंद्रीय बजट 2026 पर प्रतिक्रिया देते हुए स्वामी ने कहा कि इसे ‘ऐतिहासिक’ बताकर मांस निर्यात से जुड़ी छूटों को बढ़ावा देना उचित नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने प्रश्न किया कि क्या जीव-हिंसा से जुड़ी नीतियां किसी भी दृष्टि से विकास का प्रतीक मानी जा सकती हैं।
स्वामी ने दावा किया कि वर्ष 2017 से पहले प्रदेश में मांस उत्पादन लगभग 7.5 लाख टन था, जो अब 13 लाख टन से अधिक बताया जा रहा है। उनके अनुसार पिछले नौ वर्षों में करोड़ों पशुओं का वध हुआ है, जिसे वैध वधशालाओं के माध्यम से सरकारी संरक्षण प्राप्त है। उन्होंने कहा कि सच्चा धर्म शांति और संतोष का मार्ग दिखाता है, किंतु आज उसे सत्ता और संसाधनों से जोड़ दिया गया है।
अंत में स्वामी ने कहा कि यदि शासन स्वयं को हिंदुत्व का प्रतिनिधि बताता है, तो उसे अपने निर्णयों और नीतियों पर गंभीर आत्ममंथन करना चाहिए।
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