राजघाट पहुंचे केजरीवाल और सिसोदिया, कोर्ट में पेश न होने के फैसले को बताया ‘सत्याग्रह'

आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल और वरिष्ठ नेता मनीष सिसोदिया मंगलवार को राजघाट पहुंचे, जहां उन्होंने महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि दी। उनके साथ दिल्ली विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष आतिशी भी मौजूद रहीं। इस दौरान दोनों नेताओं ने हाल ही में लिए गए अपने फैसले को ‘सत्याग्रह’ करार दिया।
इससे पहले केजरीवाल और सिसोदिया ने दिल्ली हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा को पत्र लिखकर स्पष्ट किया था कि वे आबकारी नीति से जुड़े मामले की सुनवाई में न तो स्वयं पेश होंगे और न ही उनकी ओर से कोई वकील अदालत में बहस करेगा।
सुनवाई पर जताई आपत्ति
दोनों नेताओं ने यह कदम सीबीआई की अपील पर न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा द्वारा सुनवाई किए जाने पर आपत्ति जताने के बाद उठाया है। उनका कहना है कि मौजूदा परिस्थितियों में उन्हें निष्पक्ष सुनवाई की उम्मीद नहीं है।
केजरीवाल का पक्ष
अरविंद केजरीवाल ने अपने पत्र में लिखा कि यह निर्णय उन्होंने अपनी अंतरात्मा की आवाज पर लिया है और इसके परिणामों का सामना करने के लिए तैयार हैं। उन्होंने माना कि इससे उनके कानूनी हित प्रभावित हो सकते हैं, लेकिन फिर भी वे अपने फैसले पर कायम हैं। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि वे इस मामले में सुप्रीम कोर्ट जाने का विकल्प खुला रखेंगे।
उन्होंने अपने पत्र में यह भी दोहराया कि न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होते हुए दिखाई भी देना चाहिए। उन्होंने महात्मा गांधी के सत्याग्रह का उल्लेख करते हुए इसे एक सिद्धांत आधारित कदम बताया।
सिसोदिया ने भी जताई असहमति
मनीष सिसोदिया ने भी न्यायमूर्ति शर्मा को लिखे पत्र में साफ किया कि उनकी ओर से कोई वकील अदालत में पेश नहीं होगा। उन्होंने मौजूदा हालात पर सवाल उठाते हुए कहा कि उन्हें न्याय मिलने की उम्मीद नहीं दिखती और ऐसे में उनके पास सत्याग्रह का रास्ता ही बचा है।
क्या है पूरा मामला
यह मामला दिल्ली की आबकारी नीति से जुड़ा है, जिसमें सीबीआई ने ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें केजरीवाल सहित 23 आरोपियों को बरी किया गया था। इस अपील पर फिलहाल न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा सुनवाई कर रही हैं।
13 अप्रैल को केजरीवाल ने खुद अदालत में पेश होकर न्यायमूर्ति से मामले से अलग होने की मांग की थी, लेकिन 20 अप्रैल को अदालत ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी। अदालत ने तब कहा था कि किसी भी राजनीतिक व्यक्ति को न्यायपालिका पर अविश्वास फैलाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
इसके बाद दोनों नेताओं द्वारा सुनवाई से दूरी बनाने और इसे ‘सत्याग्रह’ बताने से यह मामला एक नए राजनीतिक और कानूनी मोड़ पर पहुंच गया है।
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