रिटायरमेंट के बाद 85 की उम्र में जीती कानूनी जंग, हाईकोर्ट का पूर्व दरोगा के पक्ष में फैसला

HIGHLIGHTS
- 2010 में डीजीपी ने पदोन्नति का दावा खारिज किया था।
- राज्य लोक सेवा अधिकरण ने भी उनकी याचिका और समीक्षा याचिका खारिज की थी।
- विभाग प्रतिकूल प्रविष्टियों की जानकारी दिए जाने का प्रमाण नहीं दे सका।
इंस्पेक्टर बनने के लिए 46 साल तक चली कानूनी लड़ाई को एक दरोगा ने सेवानिवृत्ति के बाद 85 वर्ष की उम्र में जीत लिया। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पूर्व दरोगा को 16 मार्च 1980 से इंस्पेक्टर पद पर पदोन्नति का लाभ देने का आदेश दिया है।
यह फैसला न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति सत्यवीर सिंह की खंडपीठ ने इटावा निवासी राम अवतार सिंह यादव की याचिका पर सुनाया। कोर्ट ने कहा कि पुलिस विभाग यह साबित नहीं कर सका कि जिन प्रतिकूल प्रविष्टियों के आधार पर उनकी पदोन्नति रोकी गई थी, उनके बारे में उन्हें कभी जानकारी दी गई थी। अदालत ने माना कि पदोन्नति के मामले में पुलिस विभाग ने याची के साथ अन्याय और भेदभाव किया।
राम अवतार सिंह यादव वर्ष 1999 में थानाध्यक्ष के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। पदोन्नति नहीं मिलने के बाद उन्होंने विभाग के समक्ष प्रत्यावेदन दिया। छह अप्रैल 2010 को डीजीपी ने उनकी पदोन्नति के दावे को खारिज कर दिया।
इसके बाद राम अवतार सिंह यादव ने राज्य लोक सेवा अधिकरण का रुख किया। अधिकरण ने 30 नवंबर 2012 को उनकी याचिका और 10 जून 2013 को समीक्षा याचिका भी खारिज कर दी। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की, जिसे 16 फरवरी 2015 को अदम पैरवी के कारण खारिज कर दिया गया। इसके बाद याची ने पुनर्स्थापना अर्जी दाखिल की।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने पहले खारिज हो चुकी याचिका को बहाल किया और मामले की मेरिट के आधार पर सुनवाई शुरू की। कोर्ट ने पाया कि तत्कालीन डीजीपी के आदेश में उल्लेख था कि याची को पदोन्नति के लिए चयन प्रक्रिया में शामिल किया गया था और उनका साक्षात्कार भी हुआ था।
हालांकि, विभाग याची और अन्य सफल अभ्यर्थियों के प्राप्त अंकों से संबंधित कोई रिकॉर्ड या अंकपत्र अदालत के सामने पेश नहीं कर सका।
'याची को प्रतिकूल प्रविष्टियों की जानकारी नहीं दी गई'
याची की सेवा पुस्तिका में वर्ष 1973, 1975, 1978, 1979, 1981, 1987 और 1994 की प्रतिकूल प्रविष्टियों का उल्लेख था। लेकिन विभाग यह साबित करने में असमर्थ रहा कि इन प्रविष्टियों की जानकारी याची को विधिवत दी गई थी।
वहीं, राम अवतार सिंह यादव की ओर से भी यही दलील दी गई कि उन्हें इन प्रतिकूल प्रविष्टियों के बारे में कभी जानकारी नहीं दी गई।
अधिकरण के रवैये पर कोर्ट की टिप्पणी
हाईकोर्ट ने अधिकरण के रवैये पर भी कड़ी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति से यह साबित करने की उम्मीद नहीं की जा सकती कि उसे कोई जानकारी कभी दी ही नहीं गई। अदालत के अनुसार, नकारात्मक तथ्य को साबित करना संभव नहीं होता।
कोर्ट ने कहा कि विभाग को यह साबित करना चाहिए था कि याची को प्रतिकूल प्रविष्टियों के बारे में विधिवत जानकारी दी गई थी। अधिकरण ने इस पहलू पर याची पर नकारात्मक तथ्य साबित करने की जिम्मेदारी डालकर कानूनी गलती की।
चार सप्ताह में लाभ देने का आदेश
हाईकोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया है कि राम अवतार सिंह यादव को 16 मार्च 1980 से इंस्पेक्टर पद पर पदोन्नति का लाभ दिया जाए। इसके साथ ही सेवानिवृत्ति तक का वेतन और अन्य अनुमन्य लाभों की गणना करने तथा उसके अनुरूप सेवानिवृत्तिगत लाभों का भुगतान चार सप्ताह के भीतर करने का आदेश दिया गया है।
राम अवतार की नियुक्ति से हाईकोर्ट के फैसले तक का सफर
- नियुक्ति: राम अवतार सिंह यादव पुलिस विभाग में उपनिरीक्षक के पद पर नियुक्त हुए और बाद में स्टेशन ऑफिसर के पद पर कार्यरत रहे।
- 16 मार्च 1980: हाईकोर्ट ने इसी तारीख से उन्हें इंस्पेक्टर पद पर पदोन्नति का लाभ देने का आदेश दिया।
- 1973 से 1996: विभागीय रिकॉर्ड में अलग-अलग वर्षों की प्रतिकूल और दंडात्मक प्रविष्टियों का उल्लेख किया गया।
- 1999: राम अवतार सिंह यादव स्टेशन ऑफिसर के पद से सेवानिवृत्त हुए। उस समय तक पदोन्नति का विवाद सुलझ नहीं सका था।
- 6 अप्रैल 2010: डीजीपी ने उनकी पदोन्नति के दावे को खारिज कर दिया।
- 30 नवंबर 2012: राज्य लोक सेवा अधिकरण ने उनकी याचिका खारिज कर दी।
- 10 जून 2013: अधिकरण ने समीक्षा याचिका भी खारिज कर दी।
- 16 फरवरी 2015: हाईकोर्ट में दाखिल रिट याचिका अदम पैरवी के कारण खारिज हो गई।
- 11 दिसंबर 2025: याची की बहाली अर्जी भी पैरवी के अभाव में खारिज कर दी गई।
- मई-जुलाई 2026: 85 वर्षीय याची लगातार हाईकोर्ट में उपस्थित होकर बहाली और पदोन्नति के मामले की पैरवी करते रहे। कोर्ट ने विभाग से पुराने रिकॉर्ड और पदोन्नति प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेज तलब किए।
- अगस्त 2026: हाईकोर्ट से याची को जीत मिली।
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