लिव-इन में रहने वाले जोड़ों को परिवारिक दबाव से मिले सुरक्षा: दिल्ली हाईकोर्ट

नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले वयस्कों को परिवार या रिश्तेदारों की धमकियों से सुरक्षा मिलनी चाहिए। अदालत ने इस अवसर पर यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे रिश्ते कानूनी रूप से विवाह नहीं माने जाते, लेकिन व्यक्तिगत सहमति और अधिकार के दृष्टिकोण से इन्हें विवाह के समान सम्मान मिलना चाहिए।
अदालत की राय
न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी की पीठ ने कहा कि भारत में विवाह तभी मान्यता प्राप्त है जब दो सहमति देने वाले वयस्क इसके लिए तैयार हों, चाहे उनकी जाति, धर्म, रंग या आस्था कुछ भी हो। अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत प्रत्येक वयस्क को जीवनसाथी चुनने का अधिकार बताया।
सुरक्षा की मांग और याचिका
याचिकाकर्ताओं ने अदालत से सुरक्षा की मांग की थी क्योंकि महिला के पिता उनके लिव-इन रिश्ते को लेकर परेशान कर रहे थे और धमकियां दे रहे थे। अदालत ने इस याचिका को स्वीकार करते हुए पुलिस को निर्देश दिया कि दोनों वयस्कों को आवश्यक सुरक्षा प्रदान की जाए।
लिव-इन अनुबंध और मान्यता
अदालत ने बताया कि याचिकाकर्ताओं ने 17 फरवरी 2026 को अपने रिश्ते को औपचारिक रूप देने के लिए एक लिव-इन रिलेशनशिप अनुबंध किया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ऐसे रिश्ते में किसी भी परिवारिक सदस्य, रिश्तेदार या मित्र को दखल देने या धमकाने का अधिकार नहीं है।
पुलिस सुरक्षा के निर्देश
कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को यह सलाह दी कि वे संबंधित थाना के एसएचओ या बीट कांस्टेबल से संपर्क करें। यदि वे अपना घर बदलते हैं, तो तीन दिनों के भीतर एसएचओ को सूचना देना अनिवार्य होगा, ताकि सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। अदालत ने जोर देकर कहा कि वयस्कों का सहमति आधारित रिश्ता सम्मान और सुरक्षा का हकदार है।
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