'निजी परिसर में नमाज और धार्मिक आयोजनों पर रोक नहीं लगा सकते', कोर्ट की सख्त टिप्पणी

इलाहाबाद। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी भी व्यक्ति के निजी परिसर में धार्मिक अनुष्ठान या प्रार्थना करने पर प्रशासन या अन्य किसी समूह द्वारा रोक नहीं लगाई जा सकती। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने यह टिप्पणी उस याचिका पर की जिसमें रमजान के दौरान एक स्थल पर नमाजियों की संख्या सीमित करने के जिला प्रशासन के निर्णय को चुनौती दी गई थी।
अनुच्छेद-25 की रक्षा
कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद-25 प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म को मानने, उसका पालन करने और प्रचार करने का समान अधिकार देता है। यह अधिकार सभी धर्मों और समुदायों पर समान रूप से लागू होता है।
याचिका का विवरण
संभल निवासी मुनाजिर खान ने याचिका दायर कर गाटा संख्या 291 पर स्थित एक स्थल को मस्जिद मानते हुए वहां नमाज अदा करने की अनुमति मांगी थी। उनका कहना था कि प्रशासन ने कानून-व्यवस्था के नाम पर नमाजियों की संख्या 20 तक सीमित कर दी थी, जो अनुचित है।
कोर्ट ने कहा कि प्रशासन को किसी निजी स्थल पर प्रार्थनाओं के खिलाफ कोई शिकायत मिलने पर उसका संज्ञान लेना चाहिए। जरूरत पड़ने पर पूजा स्थल और उपासकों को सुरक्षा प्रदान करना प्रशासन की जिम्मेदारी है। सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य और नैतिकता के आधार पर ही प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, लेकिन निजी परिसर में शांतिपूर्ण प्रार्थना करने से किसी को रोका नहीं जा सकता।
मासिक प्रार्थना की अनुमति
याचिकाकर्ता ने अपने दादा द्वारा 1995 में मस्जिद निर्माण के लिए समर्पित भूमि का हवाला देते हुए प्रार्थना की अनुमति मांगी थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वर्तमान में उस स्थल को मस्जिद नहीं माना गया, लेकिन चूंकि वहां पहले से नमाज अदा होती रही है, इसलिए श्रद्धालुओं को प्रार्थना करने से नहीं रोका जाएगा।
सहनशीलता और आपसी सम्मान पर जोर
कोर्ट ने ‘मैरानाथ फुल गॉस्पेल मिनिस्ट्रीज’ बनाम उत्तर प्रदेश मामले का हवाला देते हुए दोहराया कि निजी संपत्तियों में धार्मिक गतिविधियों में कोई हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। कोर्ट ने भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता की सराहना करते हुए कहा कि गणतंत्र की ताकत सहनशीलता और आपसी सम्मान में निहित है।
न्यायालय ने यह भी बताया कि अनुच्छेद-25 केवल आस्तिकों को ही नहीं, बल्कि नास्तिकों को भी अपने विचारों और धर्म के प्रचार की स्वतंत्रता देता है। कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि इस आदेश की प्रति पुलिस महानिदेशक और अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) को भेजी जाए, ताकि इसे जमीनी स्तर पर लागू किया जा सके।
सरकार की दलील
एडिशनल एडवोकेट जनरल ने कोर्ट में कहा कि याची ने यह स्पष्ट नहीं किया कि नमाजियों की संख्या किसने सीमित की थी।
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