ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर लोकसभा में सोमवार को होगी चर्चा

संसद का बजट सत्र 9 मार्च से दूसरे चरण में शुरू होने जा रहा है और इस दौरान लोकसभा में स्पीकर ओम बिरला को हटाने के विपक्षी प्रस्ताव पर चर्चा हो सकती है। विपक्ष ने आरोप लगाया है कि बिरला ने खुले तौर पर पक्षपातपूर्ण तरीके से कार्य किया। कांग्रेस ने इस प्रस्ताव को नियमों और संसदीय परंपराओं के अनुरूप बताया है।
118 विपक्षी सांसदों ने नोटिस दिया
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि तृणमूल कांग्रेस को छोड़कर सभी विपक्षी दलों ने इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए हैं। उन्होंने बताया कि इस नोटिस पर कुल 118 सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं और उम्मीद है कि 9 मार्च को इस पर चर्चा होगी। जयराम रमेश ने कहा, "यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। ऐसा पहले भी हो चुका है, उदाहरण के लिए 1954 में स्पीकर जी वी मावलंकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया गया था।"
कांग्रेस का कहना: बहस जरूरी
कांग्रेस नेता ने कहा कि संसदीय लोकतंत्र के तहत विपक्ष को इस प्रक्रिया का अधिकार है। उन्होंने बताया कि स्पीकर के पक्षपातपूर्ण व्यवहार के ठोस उदाहरण विपक्ष ने प्रस्तुत किए हैं, जबकि विपक्षी सदस्यों पर झूठे आरोप लगाए गए। जयराम रमेश ने कहा कि इस मुद्दे पर पारदर्शी और विस्तृत बहस होनी चाहिए।
स्पीकर को हटाने की प्रक्रिया
आगामी सोमवार को लोकसभा में ओम बिरला के खिलाफ प्रस्ताव पर चर्चा होगी। इस दौरान वह अध्यक्ष की कुर्सी पर नहीं बैठेंगे, बल्कि सदस्यों के बीच रहेंगे। नियमों के अनुसार, बिरला को सदन में बोलने और अपना बचाव करने का पूरा अधिकार होगा, साथ ही वह प्रस्ताव के खिलाफ मतदान भी कर सकते हैं।
संविधान विशेषज्ञ पी डी टी आचार्य के अनुसार, जब इस प्रकार का नोटिस विचाराधीन हो, तो स्पीकर सदन की कार्यवाही का संचालन नहीं कर सकता। ऐसा ही इस बार भी होगा।
नोटिस देने का कारण
विपक्ष का आरोप है कि स्पीकर ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर विपक्षी नेताओं, जिसमें राहुल गांधी भी शामिल हैं, को बोलने की अनुमति नहीं दी। इसके अलावा आठ विपक्षी सांसदों को निलंबित कर दिया गया था। कांग्रेस की ओर से गौरव गोगोई, के सुरेश और मोहम्मद जावेद ने यह नोटिस लोकसभा सचिवालय को सौंपा।
संविधान के प्रावधान
अनुच्छेद 96 के अनुसार, जब अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को हटाने का प्रस्ताव सदन में लाया जाता है, तो वह सदन की अध्यक्षता नहीं कर सकता, लेकिन अपने पक्ष में बोलने और बचाव का पूरा अधिकार रखता है। प्रस्ताव को साधारण बहुमत से पास किया जा सकता है।
पहली बार नहीं
यह पहली बार नहीं है जब किसी लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आया हो। इससे पहले जी वी मावलंकर (1954), हुकम सिंह (1966) और बलराम जाखड़ (1987) के खिलाफ ऐसे प्रस्ताव लाए गए थे, लेकिन ये सभी सदन में असफल रहे थे।
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