सीएजी रिपोर्ट में खुलासा: दिल्ली आबकारी नीति में 2,026 करोड़ का नुकसान

नई दिल्ली। विधानसभा की लोक लेखा समिति (पीएसी) ने सोमवार को सदन में सीएजी की दूसरी रिपोर्ट पेश की, जिसमें आबकारी विभाग की शराब नीति में व्यापक गड़बड़ी और भ्रष्टाचार की जानकारी सामने आई। 2024 की सीएजी रिपोर्ट (रिपोर्ट संख्या 1) के अनुसार, दिल्ली सरकार को आबकारी नीति में हुई अनियमितताओं के कारण लगभग 2,026.91 करोड़ रुपये का राजस्व नुकसान हुआ।
भ्रष्टाचार और नीति में बदलाव
पीएसी ने पाया कि कुछ बोलीदाताओं को फायदा पहुँचाने के लिए नीति में बदलाव किए गए। सीएजी ने 2017-18 से 2020-21 तक के निष्पादन ऑडिट के साथ इसे 2021-22 की नई आबकारी नीति और 1 सितंबर 2022 की पुरानी नीति तक बढ़ाया। पीएसी अध्यक्ष अजय महावर ने बताया कि नई नीति का उद्देश्य राजस्व बढ़ाना और उपभोक्ता अनुभव सुधारना था, लेकिन इसका नतीजा उल्टा निकला।
नई नीति से 8,900 करोड़ रुपये की कमाई का दावा किया गया था, जबकि राज्य को वास्तविक रूप से लगभग 2,000 करोड़ का नुकसान हुआ।
ऑडिट में उजागर खामियां
ऑडिट ने ईएससीआईएमएस (Excise Supply Chain Information Management System) से लेकर लाइसेंस जारी करना, मूल्य निर्धारण और गुणवत्ता नियंत्रण तक कई गंभीर कमियों को उजागर किया। कुल 59 लाइसेंसधारियों की जांच में 13 के रिकॉर्ड विभाग से गायब पाए गए। विभाग ने ऑडिट टीम को कई फाइलें भी उपलब्ध नहीं कराईं।
कार्टेल और सिंडिकेट गठन
17 नवंबर 2021 से लागू नीति ने सिंडिकेट और कार्टेल गठन को बढ़ावा दिया। अगस्त 2022 में नीति वापस ली गई, लेकिन मामले की जांच CBI और ED कर रही हैं।
सरकारी निगमों को खुदरा दुकानों से पूरी तरह हटा दिया गया और थोक लाइसेंस 14 निजी इकाइयों को दे दिए गए। इससे एकाधिकार और मिलीभगत की आशंका बढ़ गई।
बारकोड और ट्रैकिंग में गड़बड़ी
रिपोर्ट के अनुसार:
- 28% बिक्री यानी 136.53 करोड़ बारकोड सिस्टम को बायपास कर बेचे गए।
- 21% बिक्री POS पर स्कैन नहीं हुई।
- 2019 में मासिक स्टॉक रियलाइजेशन में 30.87% अंतर।
- कुछ वेंडरों ने 70-98% शराब बिना स्कैन किए बेची।
- 25.70 करोड़ बारकोड का हिसाब नहीं।
इससे बिना टैक्स शराब तस्करी और कालाबाजारी को बढ़ावा मिला। विभाग ने ट्रेनिंग की कमी और पुराने बारकोड को बहाना बताया, लेकिन असल में निगरानी व्यवस्था फेल रही।
एक व्यक्ति को कई लाइसेंस, नियमों की अनदेखी
दिल्ली आबकारी नियम 2010 के नियम 35 का उल्लंघन कर एक व्यक्ति को कई लाइसेंस दिए गए। पुलिस वेरिफिकेशन के बजाय सेल्फ-एफिडेविट पर भरोसा किया गया। एक लाइसेंसधारी पर एफआईआर होने के बावजूद केवल 8 लाख का जुर्माना लगाया गया।
एल-1 लाइसेंस का नवीनीकरण तब किया गया जब उसने 46% शराब जमा की थी। एल-1एफ लाइसेंसधारियों ने बैलेंस शीट जमा नहीं की, फिर भी लाइसेंस जारी हुए।
मूल्य निर्धारण और मुनाफा खेल
- आईएमएफएल और एफएल पर ईडीपी/ईबीपी घोषणाओं की निगरानी न होने से 165 करोड़ रुपये का नुकसान।
- एल-1 लाइसेंसधारियों ने 14 ब्रांडों में से 7 पर अधिक ईडीपी घोषित कर 35.07 करोड़ का लाभ कमाया।
- खुदरा मूल्य में 44-347% तक लाभ मार्जिन दिखाया गया।
शराब का घोटाला, स्वास्थ्य का भी खतरा
- एनएबीएल मान्यता बिना वाली प्रयोगशालाओं की रिपोर्ट स्वीकार की गई।
- 173 परीक्षण रिपोर्टों में से एक भी ब्रांड BIS मानक पर खरा नहीं उतरा।
- वाइन में अल्कोहल 5% होने के बावजूद वाइन के रूप में बेची गई।
- विभाग ने पुरानी रिपोर्ट स्वीकार कर आंखें मूंद लीं।
पीएसी की सिफारिशें
समिति ने विभाग को सुधार के लिए सुझाव दिए:
- रीयल-टाइम एंड-टू-एंड बारकोड ट्रैकिंग लागू हो।
- ईआईबी मॉड्यूल खुफिया जानकारी के लिए इस्तेमाल किया जाए।
- आईटी कैडर भर्ती और गुणवत्ता परीक्षण अनिवार्य रूप से एनएबीएल लैब से हो।
- लाइसेंसधारियों की आपराधिक पृष्ठभूमि, सॉल्वेंसी और नैतिक चरित्र की जांच अनिवार्य हो।
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