चौधरी चरण सिंह और अटल बिहारी वाजपेयी ने रखी थी NDA की नींव: जयंत चौधरी

मुजफ्फरनगर। शहर के नुमाइश मैदान में आयोजित जनसभा के जरिए भाजपा-रालोद गठबंधन ने आगामी विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर अपनी रणनीतिक मौजूदगी दर्ज कराई। मंच से जहां विकास और विरासत की बात हुई, वहीं ‘ऋषि और कृषि’ को जोड़ते हुए भविष्य की दिशा का संकेत भी दिया गया।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने संबोधन में भारत रत्न चौधरी चरण सिंह के योगदान को विस्तार से याद करते हुए किसानों से सीधा संवाद स्थापित करने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि चौधरी चरण सिंह ने किसानों को देश की नीतियों के केंद्र में लाने का काम किया। करीब 45 मिनट के भाषण में उन्होंने बार-बार किसानों के हितों को लेकर उनके प्रयासों का उल्लेख किया। साथ ही उन्होंने मुजफ्फरनगर को चौधरी अजित सिंह की कर्मभूमि बताते हुए क्षेत्र के राजनीतिक महत्व को भी रेखांकित किया।
केंद्रीय राज्यमंत्री और रालोद अध्यक्ष जयंत चौधरी ने भी मंच से अपने दादा चौधरी चरण सिंह को श्रद्धांजलि दी। उन्होंने कहा कि उन्होंने कभी जाति की राजनीति नहीं की, बल्कि हमेशा समाज के समग्र विकास की बात की। जयंत चौधरी ने यह भी दावा किया कि एनडीए की बुनियाद 1983 में चौधरी चरण सिंह और अटल बिहारी वाजपेयी के प्रयासों से रखी गई थी, जो आज एक मजबूत गठबंधन के रूप में आगे बढ़ रही है।
जनसभा में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों पर भी स्पष्ट संदेश देने की कोशिश की गई। मंच से गन्ना मूल्य बढ़ाने का मुद्दा उठाते हुए किसानों को साधने का प्रयास किया गया और संकेत दिए गए कि 2027 के चुनाव में चौधरी चरण सिंह के नाम पर क्षेत्र की किसान राजनीति को फिर से मजबूत किया जाएगा।
मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में शुकतीर्थ का उल्लेख करते हुए क्षेत्र की आध्यात्मिक विरासत को भी सामने रखा। उन्होंने कहा कि यह भूमि महर्षि शुकदेव की तपस्थली रही है, जिससे यहां की सांस्कृतिक पहचान और भी मजबूत होती है।
साथ ही, उन्होंने पूर्व की सरकारों पर अप्रत्यक्ष हमला बोलते हुए कहा कि पहले प्रदेश के कई जिलों—जैसे मुजफ्फरनगर, शामली, मेरठ, बुलंदशहर, गाजियाबाद और मुरादाबाद—की पहचान को लेकर संकट था, लेकिन अब डबल इंजन सरकार के तहत औद्योगिक विकास और निवेश के चलते हालात बदले हैं।
जनसभा में कांवड़ यात्रा और कोरोना काल का भी जिक्र हुआ। मुख्यमंत्री ने कहा कि पहले जहां कांवड़ यात्रा पर पाबंदियां लगती थीं, वहीं अब श्रद्धालुओं पर पुष्पवर्षा की जाती है। कोरोना काल में भी सरकार ने लोगों की हरसंभव मदद की।
हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों का असर भी इस सभा में देखने को मिला। दादरी और सकौती में हुई सभाओं के बाद पश्चिमी यूपी में बढ़ी सियासी हलचल के बीच इस जनसभा को अहम माना जा रहा है। मंच से जातीय राजनीति से ऊपर उठकर समाज और देश के हित में काम करने का संदेश दिया गया और महापुरुषों को जाति के दायरे में बांधने का विरोध किया गया।
कुल मिलाकर, नुमाइश मैदान की यह जनसभा न केवल विकास और विरासत के मुद्दों पर केंद्रित रही, बल्कि आने वाले चुनावों के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राजनीतिक माहौल तैयार करने की दिशा में भी एक बड़ा संकेत मानी जा रही है।
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